उड़िया कहानियों में सामाजिक सौंदर्यबोध और संवेदनात्मक दृष्टि
| Vol-4 | Issue-02 | February 2019 | Published Online: 20 February 2019 PDF ( 238 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डॉ. रमेश कुमार गोहे 1 | ||
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1सहायक प्राध्यापक, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर (छ.ग.) |
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| Abstract | ||
गद्य का विकास भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रायः एक समय ही हुआ और इसके लिए महत्वपूर्ण कारक मुद्रण यंत्रों की स्थापना ही मानी जाती है। जब कटक में मुद्रण यंत्र की स्थापना की गई वह 19वीं शताब्दी का अंतिम चरण था। फिर वहां कई पत्रिकाएं प्रकाशित हुईं। भले ही देशी भाषाएं हमें स्वतंत्र रूप में दिखाई देती हैं किंतु उनकी सांस्कृतिक यात्रा भी कठिन है। कहीं-कहीं तो उनके सामंजस्य के साथ आगे बढ़ने की कहानी मिलती है और कहीं आपसी आंतरिक विरोध। “अंग्रेजी राज कायम होने पर ऐसा विरोध बंगला-उड़िया, बंगला-असमिया के बीच दिखाई देता है। सहयोग और आंतरिक विरोध दोनों ही देशी भाषाओं में साहित्य-रचना-प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।”1 अगर यहां ध्यान दिया जाए तो उड़िया-बंगला दोनों पृथक होकर अपनी-अपनी भाषाओं में साहित्य को समृद्ध ही करती हैं। उड़िया कहानियों के अध्ययन में भाषा और उसके विकास की ओर एक दृष्टि डालना ठीक ही होगा। इस आलेख का उद्देश्य उन्हीं कहानियों में से कुछ चुनिंदा कहानियों की विवेचना करना है, जहाँ कहानियों के संवेदनात्मक पक्ष की पड़ताल करना ही इस आलेख का ध्येय होगा। |
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| Keywords | ||
| कहानी, संवेदना, सामाजिक भावबोध, सौंदर्यबोध, सामाजिक परिवेश । | ||
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