आदिवासी हिन्दी उपन्यास ‘जंगल के फूल’ में समाजवादी जन-चेतना
| Vol-5 | Issue-2 | February-2020 | Published Online: 16 February 2020 PDF ( 99 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ. करतार सिंह 1; कान्ति देवी मीना 2 | ||
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1सह आचार्य हिन्दी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर (राज.) 2शोधार्थी हिन्दी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.) |
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| Abstract | ||
समाजवादी जनचेतना पाश्चात्य साहित्य से प्रभावित है। ‘समाजवाद’ और ‘जनवादी’ ये दोनों शब्द का अर्थ समान होता है। समाजवादी जनचेतना की सर्व सम्मत परिभाषा करना कठिन है क्यांेकि जनचेतना को पाश्चात्य तथा भारतीय मनीषियों ने अपने-अपने मतों के अनुसार परिभाषित किया है। जनचेतना कला, साहित्य और जीवन के विशिष्ट दृष्टिकोण है, जो जनसामान्य को महत्व देता है। माक्र्स ने समाज और उसके विविध रूपों की जो व्याख्या की वह कला और साहित्य को लागू होती है। समाजवादी जनचेतना का वास्वविक अर्थ है साम्रज्यवादी, पूंजीवाद और पीड़ित जन के साथ वास्तविक हमदर्दी। जनवादी चेतना यानी की समाजवादी चेतना का लक्ष्य सामंतीय व्यवस्था का विरोध करते हुए सामान्य वर्ग के प्रति मानवमात्र में सहानुभूति पैदा करना, आम जनता को शिक्षित करते हुए उनके सांस्कृतिक विकास के लिए प्रयास करता है और उनके संघर्षात्मक जीवन को आवाज देकर उनके जीवन मूल्यों में परिवर्तन निर्माण करना रहा है। हर युग के श्रेष्ठ का दृष्टिकोण भी जनवादी समाज की ओर रहा है। समाजवादी जनचेतना को लेकर चलने वाले साहित्य में मानव के सामुहिक भावों की अभिव्यक्ति हुई है। जंगल के फूल उपन्यास में श्री राजेन्द्र अवस्थी ने ‘बस्तर’ जनपद के ‘गढ़ बंगाल’ और ‘बिंझली’ गांवों के आदिवासियों की संस्कृति, रीति-रिवाज, आचार-विचार आदि का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया है। इसकी कथा महुआ और सुलकसाये के ‘गढ़बंगाल’ के घोटुल में प्रथम मिलन से प्रारम्भ होती है। |
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| Keywords | ||
| जंगल के फूल, समाजवाद, जनचेतना, आदिवासी, उपन्यास। | ||
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