दलित आत्मकथा : सामाजिक उत्थान और विवेचना
| Vol-6 | Issue-10 | October-2021 | Published Online: 13 October 2021 PDF ( 291 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i10.016 | ||
| Author(s) | ||
डा0 वन्दना शर्मा
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1एसोसियेट प्रोफेसर-हिन्दी विभाग, मुलतानीमल मोदी काॅलेज, मोदीनगर (गाजियाबाद)-201204 |
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| Abstract | ||
अनुभव अथवा स्वानुभूति का लेखन निश्चित रूप से अधिक विश्वसनीय, अधिक भाव आप्लावित,अधिक व तथ्यपरक होता है। इसी सन्दर्भ में स्त्री विषयक साहित्य एवं दलित साहित्य को देखा जाना चाहिए। गैर दलित साहित्यकार व्यक्ति के तौर पर स्वयं की वैचारिकी को ही श्रेष्ठतर दिखने में वास्तविकता से प्राय: दूर निकल जाते है। सामाजिक वैषम्य एवं असमानता को दूर करना, रेखांकित करना किसी भी लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता का दायित्व अवश्य है। किन्तु उसे अतिरंजित बनाने से तो विषमता, असमानता, सामंजस्य को बढ़ावा ही मिलता है। क्यों उत्पीड़क उस असत्य से आहत आक्रोशित होता है ओर उत्पीडित के प्रति उसकी दुर्भावना बढती है। दलित साहित्य में इसीलिए दलित साहित्यकारों को अधिक विश्वसनीयता से पढ़ा जाना चहिए। |
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| Keywords | ||
| स्वानुभूति की प्रमाणिकता, समुदाय की पहचान, आत्मकथाकार का समाज, बहुसंख्यक आबादी की अस्मिता, व्यक्तिगत महत्वकाक्षाएं, अनुभव से साक्षात्कार, स्वात:सुखाय साहित्य के दूरगामी प्रभाव | ||
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