वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों में सामाजिक चिंतन
| Vol-6 | Issue-09 | September-2021 | Published Online: 15 September 2021 PDF ( 283 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i09.011 | ||
| Author(s) | ||
आरती देवी
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1पीएच.डी. शोधार्थी, हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू |
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| Abstract | ||
गोरखपुर ज़िले के बडहलगंज ब्लॉक के सहडोली गाँव में 1 जनवरी 1962 में जन्मे डॉ. वशिष्ठ अनूप हिंदी साहित्य के युवा ग़ज़लकार हैं | वर्तमान युग में ग़ज़ल का विषय नायिका के हुस्न की तारीफ़ नहीं है बल्कि जीवन की हक़ीक़त तथा कटु यथार्थ को व्यक्त करना है। विरह की अग्नि को छोड़कर वह विद्रोह की मशाल बन चुकी है। भौतिक सुख में फंस कर नीतिपरायण व्यवहार को आदमी भूलता जा रहा है। परिवार मनुष्य के जीवन में निरंतरता, एकता तथा स्थिरता स्थापित करता है। लेखक ने समाज में बदलते मानवीय मूल्यों, स्त्री की दशा और दिशा, ग्रामीण जीवन, अकेलापन, महानगरीय जीवन, आधुनिक सभ्यता, आम आदमी की पीड़ा आदि को विषयों को अपनी ग़ज़ल के माध्यम से चित्रित किया है। |
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| Keywords | ||
| समाज, पारिवारिक विघटन, आधुनिक सभ्यता, नारी | ||
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