नाड़ियों में प्राण प्रवाह: एक सूक्ष्म दर्शन

Vol-6 | No-01 | January-2021 | Published Online: 17 January 2021    PDF ( 135 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i01.044
Author(s)
कुमारी सुमन पूनियां 1; अदिति बूरा 2

1शोध निर्देशक, सी.आर.एस.यू., जीन्द

2रोल नं. 203476, एम.ए. योग (योग विज्ञान विभाग), सी.आर.एस.यू., जीन्द

Abstract

प्राणायाम का अर्थ है प्राणों को ‘नमन’ करना है हमारे शरीर के प्राणमय कोश में चक्र और नाड़ियाँ विद्यमान है। जो प्राण प्रणाली को संचालित करती है अगर ये चक्र और नाड़ियाँ शुद्ध हो और बिना किसी दिक्कत के काम करें तो हमारा शरीर तेज व ओज से परिपूर्ण होगा तथा कान्तिमय लगेगा। योग के अनुसार मनुष्य शरीर में ऊर्जा के पाँच स्तर है; जो एक साथ विद्यमान रहते हैं तथा सबका अपना-अपना क्षेत्र होता है और ये ऊर्जा के केन्द्र होते हैं प्राण का अर्थ है सूक्ष्म जीवनी शाक्ति। प्राण के बिना जीवन संभव नहीं है और जब हमारी नाड़ियों में ऊर्जा का प्रवाह होता है तो हमारा शरीर एक किस्म का संतुलन पा लेता है हमारे प्राण व नाड़ियों के कारण ही मनुष्य के बाहरी व आंतरिक व्यवहार चाहे वो शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक हो पर प्रभाव पड़ता है तथा जब हमारी सुषुम्ना नाड़ी क्रियाशील होती है तो मनुष्य वैराग्य को प्राप्त करने लग जाता है मनुष्य को आंतरिक संतुलन अनुभव होता है आधुनिक पीढ़ी नाड़ियों में प्राण की धारणीयता को स्वीकार नहीं करती है लेकिन आधुनिक चिकित्सकों ने अपने शोधों में मना है कि प्राण के बिना शरीर पूर्ण नहीं है। विभिन्न यौगिक ग्रन्थों में नाड़ियों व प्राणों के बारे में बताया गया है जिसका हम प्रस्तुत शोधपत्र में वर्णन करेगें।

Keywords
चक्र, कोश, नाड़ियाँ, प्राण, साधना, आध्यात्मिक।
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