साहित्य में आदर्श और यथार्थ

Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019    PDF ( 277 KB )
Author(s)
डॉ. प्रमिला बी. महानन्दे 1

1जनता महाविद्यालय, चंद्रपुर

Abstract

साहित्य के संदर्भ में  आदर्श का महत्व अधिक है या यथार्थ का, यह प्रश्न उत्तर उठाया जाता है | दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि साहित्यकार को साहित्य सर्जन के प्रसंग में आदर्श को अधिक महत्व देना चाहिए या यथार्थ को ? आदर्शवाद या यथार्थवाद को महत्व देने की दृष्टि से साहित्य में अनेक वादों का प्रादुर्भाव हुआ|  अनेक वाद आए और गए  किंतु इस समस्या का हल कोई वाद विशेष नहीं कर पाया |  साहित्य में आदर्श को प्रश्रय मिले या यथार्थ को इसका निर्णय से पूर्व हमें साहित्य  के धर्म  उसकी प्रकृति पर श्रेष्ठ साहित्य के संदर्भ में विचार करना होगा| साहित्य की परिभाषा और उसकी श्रेष्ठता के मापदंड  के विषय में विभिन्न आचार्यों ने विभिन्न मत प्रकट किए हैं  | और मानव जीवन धरती पर जीता है,  उसकी  गंध की अपेक्षा वह भी कैसे वह कर भी कैसे सकता है ? यदि अत्यधिक  आदर्श-प्रेरित होकर वह धरती की उपेक्षा करता है और धरती की जगह स्वर्ग लोक की बात  करता है | तो निश्चय ही उसकी कृति में वह स्वाभाविकता और विश्वसनीयता नहीं आ पाएगी जो साहित्य का प्राण है |

Keywords
साहित्य, धर्म, मापदंड, आदर्श
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