शंकराचार्य के दर्शन में योग की अवधारणा
| Vol-2 | Issue-9 | September 2017 | Published Online: 15 September 2017 PDF ( 101 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 सीमा सिन्हा 1 | ||
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1Dept. of Philososhy, Veer kumar Singh University Ara , Bihar |
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| Abstract | ||
इस अनुसंधान के माध्यम से लौकिक एवं पारलौकिक भागों का परित्याग कर किस प्रकार शाम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति एवं तितीक्षा नामांक साधनों के माध्यम से की योग की प्राप्ति हो सकती है। शम का मन के संयम से, दम का अर्थ इन्द्रियों के नियंत्रण से, श्रद्धा का अर्थ शास्त्रों के प्रति निष्ठा भाव से, समाधान का अर्थ शास्त्रों के प्रति निष्ठा भाव से, समाधान का अर्थ चित् को ज्ञान के साधन में लगाने से, उपरति का अर्थ कार्यो से विरक्त करने से, तितिक्षा का अर्थ उष्ण और शीत आदि इन्द्रियों को सहन करने से है। योग साधना के द्वारा मानवीय ज्ञान के समस्त ज्ञात अज्ञात साधनों का विकास करके परमतत्व परम सत्य आत्म प्रभा की अपरोक्षानुभूति प्राप्त की जाती है। |
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| Keywords | ||
| योग की अवधारणा साधना, चातुष्य जीवनमुक्ति, आधिकारिक निरूपण। | ||
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