संस्कृत नाटकों में नारीवादी यौनिकता- एक आलोचनात्मक मूल्यांकन

Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019    PDF ( 2 MB )
Author(s)
रजनी 1

1पीएच.डी. शोधार्थी, राजनीतिक विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

Abstract

भारत में नारी यौनिकता का सषक्तिकरण युगों-युगों में परिवर्तित रहा है जिसकी एक सकारात्मक रूप में शुरूआत हमारे सांस्कृतिक स्रोतों में रही है जैसे वेद, पुराण, शास्त्र, नाट्य, काव्य, महाकाव्य इत्यादि स्रोत भारत की संस्कृति और धरोहर है जिसके आधार में नारी का स्थान समाहित है जहां स्त्री की यौनिकता को पवित्र रूप में बताया गया है जैसा कि वेंडी डोनिजर अपनी कृति द हिंदू में लिखती हैजो कि नारी की यौनिकता को एक सकारात्मक दषा और दिषा में दर्षाता है। नारी यौनिकता एक शक्ति के प्रदर्षन को दर्षाती है समकालीन युग में नारी समाज के विचारों को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है जिसका सबसे बड़ा स्रोत नारी का बाजार में होने वाला आगमन है जिसके बिना कोई कार्य संभव नहीं फिर भले हीवह कोई फिल्म, नाटक, विज्ञापन, व्यापार हो यहां तक की राजनीति जैसे सभी बड़े क्षेत्रो को अपने में समाहित कर लिया है।

Keywords
स्त्री यौनिकता, नाटक, राजनीति, रूढ़िवाद, उदारवाद।
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