विवाह, वर्चस्ववादी व्यवस्था और सामाजिक सहमति
| Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019 PDF ( 229 KB ) | ||
| Author(s) | ||
राजलक्ष्मी
1
|
||
|
1शोधार्थी- पी-एच.डी. स्त्री अध्ययन, स्त्री अध्ययन विभाग, म.गां.अं.हि.वि.वि., वर्धा (महाराष्ट्र) |
||
| Abstract | ||
विवाह एक सार्वभौमिक सामाजिक संस्था है और हर समाज में विवाह से संबंधित अपने अलग-अलग रीतिरिवाज होते हैं । परन्तु विवाह के लिए उम्र की बात करें तो लगभग सभी समाजों में लड़की की उम्र लड़के के उम्र की अपेक्षा कम ही रहती है इसके विपरित यदि विवाह के समय लड़की,लड़के से उम्र में बड़ी हो या शारीरिक रुप से देखने में भी उससे लम्बी,मोटी हो तो वह विवाह लोगों के आश्चर्य और चर्चा का विषय जरुर बन जाता है । हमारे भारतीय संविधान में भी विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 और लड़के की उम्र 21 वर्ष निर्धारित की गयी है यहां भी लड़की,लड़के से 3 वर्ष छोटी है । किन्तु यहां इस बात पर गौर करना बेहद जरुरी है कि संविधान में भी लड़कियों के विवाह की उम्र लड़कों से कम क्यों निर्धारित की गई बराबर क्यों नहीं ? इस संबंध में कुछ बुद्धिजीवी द्वारा यह तर्क दिया जाता हैं कि चूंकि लड़कियां शारीरिक रुप से लड़कों से पहले परिपक्व हो जाती हैं इसलिए ये अंतर है। तो प्रश्न ये उठता है कि क्या एक लड़की को विवाह के लिए सिर्फ उसका शारीरिक रुप से ही परिपक्व होना जरुरी है या मानसिक रुप से भी परिपक्व होना उतना ही जरुरी है ? विवाह के उम्र के संबंध में विज्ञान, परंपरा और कानून इन तीनों का क्या तर्क है और विवाह के उम्र के आधार पर समाज में किस प्रकार का लैंगिक वर्चस्व स्थापित है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश इस पेपर के माध्यम से की जाएगी । |
||
| Keywords | ||
| विवाह, सामाजिक, वर्चस्ववादी | ||
|
Statistics
Article View: 778
|
||


