शिक्षण के रचनात्मक साधन के रूप में रंगमंच और फ़िल्म

Vol-4 | Issue-7 | July 2019 | Published Online: 15 July 2019    PDF ( 324 KB )
Author(s)
अभिषेक त्रिपाठी 1

1पीएच.डी. शोधार्थी (जुनियर रिसर्च फेलो), प्रदर्शनकारी कला (फ़िल्म एवं रंगमंच) विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र।

Abstract

रंगमंच और फ़िल्म अपनी बुनियादी तासीर में मुख्यतः मनोरंजन की विधा हैं। यद्यपि कला का उपयोगितावादी सिद्धांत इसकी (केवल मनोरंजक रूप की) खिलाफ़त करता है और इसके सामाजिक उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करता है; परंतु इस दृष्टि को इसमें शामिल कर लेने पर भी इसके मनोरंजक प्रवृत्ति की अनदेखी नहीं की जा सकती । वर्तमान शिक्षा पद्धति के व्यावहारिक उद्देश्य पर गौर करें तो एक चीज़ स्पष्ट है कि इसके मूल में आजीविका की सुरक्षा का ध्येय ही सर्वोपरि है; यही कारण है कि शिक्षा समाज में सहायता देने के साथ कुंठा का सबब भी बन रही है (असफलता की स्थिति में)। आर्थिक सुरक्षा की चिंता ने शिक्षा से रचनात्मक अंश को तिरोहित कर दिया है और बच्चे प्राथमिक स्तर से ही अनायास अंक, प्रतिशत के खेल में उलझ कर अपने ज्ञान, समझ और विकास के दायरे को संकुचित करते चले जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में रंगमंच और फ़िल्मों में मौजूद रचनात्मकता, कल्पना की स्वच्छंद उड़ान तथा उसके उपयोगितावादी सिद्धांत के फलतः मनोरंजन के साथ-साथ उसमें समाहित ज्ञान, चेतना,जागरूकता के तत्व शिक्षा में उसके लिए एक स्थान तैयार करते हैं । मूलतः दृश्य विधा होने के नाते इसका प्रभाव मानव मस्तिष्क पर चिरस्थायी होता है। शिक्षा के औपचारिक जटिल ढाँचे से अलग इसके रसास्वादन के वक्त संप्रेषित ज्ञान सहजता के साथ दृष्टा में समझ का एक व्यापक धरातल तैयार कर सकता है। यद्यपि रंगमंच से अलग फ़िल्म अपने नकारात्मक प्रभाव की दृष्टि से भी कुख्यात है और अक्सर मूल्यों की गिरावट के लिए इसे कोसा जाता है; तथापि ऐसी फ़िल्मों की लंबी सूची है जो इसके पक्ष में सकारात्मक माहौल भी बनाती हैं। इस मौजूदा जानकारी से आगे बढ़कर यह अध्ययन रचनात्मक शिक्षा के क्षेत्र में फ़िल्म और रंगमंच की भूमिका को कुछ विशिष्ट नाटक और फ़िल्म के माध्यम से देखने और आँकने की कोशिश करता है। अंतर्वस्तु विश्लेषण के जरिये इस अध्ययन को सम्पन्न किया गया है।

Keywords
शिक्षण, रचनात्मकता, रंगमंच, फ़िल्म ।
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