साहित्य, समाज और सामाजिक यथार्थ: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
| Vol-4 | Issue-6 | June 2019 | Published Online: 12 June 2019 PDF ( 296 KB ) | ||
| Author(s) | ||
डाॅ रेखा रानी
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1पी-एच0डी0, स्नातकोŸार हिन्दी विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया, बिहार (भारत) |
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| Abstract | ||
मानव की संकल्पात्मक अनुभुतियों के संचित भण्डार का नाम साहित्य है। साहित्य और समाज का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध होता है। एक ओर साहित्य का हित और सहित भाव समाज के लिए कल्याणकारी होता है, वही समाज का पारम्परिक आचरण साहित्य को शास्त्र की गरिमा प्रदान करता है। समाज साहित्य की प्रारंभिक सामग्री है और साहित्य समाज की सामग्री से निर्मित एक कलात्मक कृति है, समाज साहित्य का बीज है और साहित्य समाज रूपी बीज से विकसित वट-वृक्ष है, समाज विधि प्रकार के जलकणों का बिखरा हुआ स्वरूप है और साहित्य उन जलकणों से निर्मित विशाल सागर है। यही कारण है कि साहित्य के निर्माण में समाज का सर्वाधिक योग रहता है। सामाजिक जीवन एवं सामाजिक यथार्थ की विविध स्थितियों एवं परिस्थितियों को चित्रित करना ही साहित्य का एकमात्र कार्य है। साहित्य में सामाजिक यथार्थ समाज जैसा भी है, उसके वैसे ही चित्रण पर बल देता है। वहीं, समाजवादी यथार्थ कल्पना और आदर्श से परे ठोस और व्यावहारिक सत्य को ग्रहण करने तथा मनोवैज्ञानिक यथार्थ अचेतन मन में दमित भावनाओं एवं मन में चलने वाले द्वन्द्वात्मक और रहस्यात्मक अनुभूतियों के यथार्थ चित्रण पर बल देता है। |
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| Keywords | ||
| साहित्य, यथार्थ, समाज, सामाजिक यथार्थ, समाजवादी यथार्थ, मनोवैज्ञानिक यथार्थ। | ||
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