मानवाधिकारों के परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के प्रति हिंसा

Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019    PDF ( 137 KB )
Author(s)
मिश्रा अर्चना 1

1एसोसिएट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, एस0डी0पी0सी0गल्र्स(पी0जी0) काॅलेज, रूड़की, हरिद्वार

Abstract

महिलाओं के प्रति हिंसा एक विश्वव्यापी प्रवृत्ति है। कोई भी देश, समाज अथवा समुदाय इससे मुक्त नहीं है। महिलाओं के प्रति हिंसा के प्रत्येक रूप जैसे कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, अपहरण, बलात्कार, घरेलू हिंसा, कार्य स्थलांे पर अभद्रता आदि व्यवहारों के मूल में स्त्रियों के मानवाधिकारों का हनन ही है। आमतौर पर मानवाधिकारों का आशय व्यक्ति के उन अधिकारों से है जिनका उपयोग करने के लिए मनुष्य रूप में जन्म लेना ही पर्याप्त है तथा जो मानव व्यक्तित्व के पूर्ण विकास तथा मानवीय गरिमा की स्थापना एवं पोषण हेतु अत्यावश्यक हैं। वर्तमान समाज में मानवाधिकारों की संरक्षा की दृष्टि से महिलाओं की खराब स्थिति एवं उनके प्रति बढ़ते अपराध, एवं हिंसात्मक व्यवहार को देखते हुए वैश्विक स्तर पर अनेकों कानूनों व संस्थाओं की स्थापना की गई है। परन्तु संविधान तथा विधि-प्रदत्त अनेकों व्यवस्थाओं के बावजूद वर्तमान समाज में मूलभूत अधिकारों के संबंध में महिलाओं की स्थिति अत्यंत चिन्तनीय है। आज विश्व में आधी आबादी महिलाओं की है। महिलायें एक मानव होने की गरिमा प्राप्त कर सकें इसके लिए आवश्यक है कि सर्वप्रथम उन्हें एक ‘व्यक्ति’ के रूप में पहचान मिले तथा शिक्षा एवं सशक्तिकरण के माध्यम से वे स्वयं के विकास के साथ-साथ समाज के उत्थान में भी सार्थक योगदान दे सकें। इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करने में निसंदेह महिलाओं के मानवाधिकारों की स्थापना एवं संरक्षण की एक विशिष्ट भूमिका है।

 

Keywords
मानवाधिकार, लैंगिक भेदभाव, हिंसा, संरक्षण, सशक्तिकरण
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