किन्नरों का सामाजिक संघर्ष

Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019    PDF ( 169 KB )
Author(s)
पूजा 1

1शोधार्थी, हिंदी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक, हरियाणा, भारत

Abstract

‘हिजड़ा‘ कहलाना किसी ‘मर्द‘ को अच्छा नही लगता, पिघला शीशा-सा कानों में उतरता है और ‘हिजड़े‘ को ‘हिजड़ा‘ कहो तो उसे गाली-सी नही लगती, पर कही अंतरस तक उसके मन मे कचोंट जरूर होती है। आखिर ईश्वर ने उसके साथ अन्याय क्यों किया़़़़? क्यों हम उन्हें अपने से दूर सामाजिक दायरे से बाहर हाशिए पर रखते चले आ रहे हैं़़़़? उनके प्रति हमारी सोच में अश्लीलता का चश्मा क्यों चढ़ा रहता है़़़़? एक मनुष्य होकर दूसरे मनुष्य के साथ इतनी क्रूरता, मानवता को शर्मसार करती है। किन्नर बच्चे के जन्म लेते ही उसे फेंक दिया जाता है या फिर माता-पिता अपने नवजात बच्चे को किन्नरों के समूह को सौंप देते हैं, सिर्फ इस वजह से कि वह यौन विक्लांग है। समाज किन्नरों को अपना अशं नही मानता। लोग उनके तौर-तरीके देखकर डरते हैं, कुछ उन पर हॅसते हैं। उन्हें आर्थिक मजबूरी में चैराहों, सड़कों पर लोगों से पैसे माॅगने पड़तें है और लोग उन्हें देखकर आॅंखें फेर लेते है।

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