मंगलेश डबराल के साहित्य में समाज
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019 PDF ( 248 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| हरिओम पुत्र श्री बालूराम 1 | ||
| Abstract | ||
साहित्यकार समस्त समाज को सम्मुख रखकर लोककल्याणार्थ लिखता है, समाज में रहता है, समाज में रहकर वह जो अनुभव करता है, उसी को शब्दबद्ध करके समाज के सम्मुख रखता है। उसकी रचना में चारों ओर के वातावरण का प्रत्यंकन जाने-अनजाने में हो जाता है। उसकी रचना के पीछे उसका व्यक्तित्व भी रहता है, साथ में उसके देशकाल का संबंध भी रहता है। साहित्य का धर्म परिवेश के यथार्थ चित्रण में है। साहित्य समाज व्यवस्था के विविध पक्षों, पारिवारिक संबंधों, वर्ग-संघर्ष और संभवतः पृथक्करण की प्रवृतियों व आबादी की संघटना का चित्रण करता है। सामाजिक विषमताओं तथा असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाना एक साहित्यकार का दायित्व है। समाज में फैले अन्याय, अधर्म, गुलामी, जर्जरता आदि की नींव हिलाने का काम वास्तव में एक साहित्यकार का है, तभी सार्थक रचना युग की सृष्टि बन जाएगी। इस प्रकार हम उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह निःसंकोच कह सकते हैं कि रचना प्रक्रिया से समाज और व्यक्ति का अभिन्न संबंध है अर्थात् साहित्य समाज का दर्पण है। |
||
| Keywords | ||
| शिक्षा, साहित्यकार, परंपरागत भारतीय विद्या, स्त्री की संघर्ष भरी कहानी। | ||
|
Statistics
Article View: 791
|
||

