हिन्दी का महिला लेखन: चेतना के स्वर
| Vol-1 | Issue-11 | November 2016 | Published Online: 10 November 2016 PDF | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Rekha Mishra 1 | ||
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1Lecture (Hindi), Government College, Newai (Tonk), Rajasthan |
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| Abstract | ||
हिन्दी साहित्य में महिला लेखन का उद्भव केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति का विस्तार नहीं है, बल्कि यह स्त्री की चेतना, अस्मिता, संघर्ष और स्वतंत्र अस्तित्व की उद्घोषणा भी है। प्रारंभिक दौर में स्त्रियाँ साहित्य की ‘विषयवस्तु’ मात्र थीं, परन्तु समय के साथ वे स्वयं अपनी लेखनी की ‘विषय’ और ‘वक्ता’ बनकर उभरीं। महिला लेखन ने न केवल पितृसत्तात्मक समाज द्वारा निर्मित स्त्री की रूढ़ छवियों को चुनौती दी, बल्कि जीवन के विविध पक्षों—परिवार, समाज, राजनीति, शिक्षा, प्रेम, विवाह, मातृत्व, देह और आत्मसम्मान—को अपने दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया। इस लेखन में ‘चेतना के स्वर’ अत्यंत विविध और गहन रूप में व्यक्त होते हैं। आरंभिक महिला रचनाकारों जैसे महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, और सुमित्रानंदन पंत के साथ जुड़ी स्त्री-संवेदना संवेदनात्मक और भावुक धरातल पर दिखाई देती है, जबकि बाद के दौर की लेखिकाएँ—अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, प्रभा खेतान, उषा प्रियंवदा, मैत्रेयी पुष्पा और मृदुला गर्ग—ने स्त्री जीवन की जटिलताओं, दमन, प्रतिरोध और आत्मबोध को वैचारिक गहराई के साथ उकेरा। |
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| Keywords | ||
| स्त्री चेतना, अस्मिता, प्रतिरोध, आत्मबोध, नारीवाद, हिन्दी महिला लेखन, सामाजिक परिवर्तन। | ||
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