हिंदी जाति : एक अवधारणा, एक विमर्श
| Vol-3 | Issue-12 | December 2018 | Published Online: 10 December 2018 PDF ( 474 KB ) | ||
| Author(s) | ||
डॉ. बीरेन्द्रसिंह
1
|
||
|
1सहायकप्राध्यापक, हिन्दीविभाग, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता |
||
| Abstract | ||
वर्तमान वैज्ञानिक युग में जहाँ तकनीकी प्रगति हमारी सोच से भी अधिक तीव्रता से विकसित हो चली है ‘जाति’ का मुद्दा अपने-अपने अर्थों के साथ अधिकांशतः अब भी ज्यों का त्यों बना हुआ है । ‘जाति’ और ‘जातीय चेतना’ जैसे शब्दों के आते ही उसके ‘कास्ट’ यानि बिरादरी वाले अर्थ मस्तिष्क में अनायास ही गूँज उठते हैं ।‘जाति’ का कोई दूसरा अर्थ भी हो सकता है यह भावना अब भी बहुतों के लिए अबूझ है – खासकर हिन्दी समाज में । ‘जाति’ का वह अर्थ जहाँ परस्पर एकत्व का भाव धर्म, वर्ण और समुदाय के संकीर्ण कटघरे से परे कोई अभिव्यक्ति पाता हो– यहाँ नदारद है । इकबाल के ‘‘हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा’’ का ‘हिन्दी’ अब कहीं देखने नहीं मिलता । यहाँ हिन्दू हैं, मुसलमान हैं; ब्राह्मण हैं, शुद्र हैं; सवर्ण हैं, दलित हैं और तो और यू.पी. वाले हैं,उत्तराखंडी हैं; बिहारी हैं,झारखंडी हैं – परन्तु ‘हिन्दी’ कहीं नहीं हैं । बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी या कि तमिल जाति के बरक्स हिन्दी जाति नहीं है ।जब ये तमाम जाति के लोग आपसी एकत्व भावना के साथ भारत देश की समृद्धि में हाथ बँटा रहे हैं तब हिन्दी जाति वाले क्या कर रहे हैं?जबकि तुलनात्मक दृष्टि से हिन्दी प्रदेश इन सभी जातीय प्रदेशों से कहीं अधिक विशाल, कहीं अधिक समृद्ध और कहीं अधिक सम्भावनाओं से भरा हुआ है । इस आलेख में हम हिंदी जाति की बिडंबनापूर्ण स्थिति को एक विमर्श रूप में विश्लेषित करने का प्रयास करेंगे । |
||
| Keywords | ||
| जातीयता और राष्ट्रीयता, हिंदी जाति, हिंदी नवजागरण | ||
|
Statistics
Article View: 2613
|
||


