हरियाणवी संगीत परम्परा में लोक गीतों का महत्व
| Vol-4 | Issue-6 | June 2019 | Published Online: 04 June 2019 PDF ( 115 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Monika 1 | ||
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1M.A., M.Phil Ph.D, Net, Music Instrumental, Dept. of Music |
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| Abstract | ||
भारत रुपी बाग का एक सुगन्धित फूल हरियाणा एक सुन्दर प्रदेश है। 18 सितम्बर, 1966 को भारत सरकार ने राज्यों को पुनर्गठित करने के लिए एक विधेयक पास किया। पंजाब पुनर्गठन विधेयक पास होने पर प्रथम नवम्बर 1966 को हरियाणा प्रदेश अस्तित्व में आया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इससे पूर्व हरियाणा शब्द से लोग परिचित ही नहीं थे। इस पवित्र-धरा, गीता की जन्मस्थली के लिए ऐसा सोचना अन्याय करने के समान है। वैदिक काल से इस शाश्वत शब्द का प्रयोग विभिन्न ग्रन्थों में होता रहा है। महाभारत काल से तो इस का नाम हरि आगमन (हरि$आयन) से जुड गया। संक्षेप में हरियाणा लोक तत्वों की खान है। इसके लोक तत्वों कों लौकिक अर्थात मानव निर्मित आपदांए एवं प्राकृतिक विपत्तियां भी नष्ट नहीं कर सकी। परन्तु आज प्रदेश की लोक संस्कृति शहरी प्रभावों से ग्रस्त है। अब लोक नृत्य, लोक-गीत, लोक नाटक आदि युग क्षेत्रीय तथा अन्तः क्षेत्रीय सांस्कृतिक समारोहांे पर ही मंचित होते है। सांग (लोक नाटय), फाल्गुनी गिदद्धा लगभग लुप्त प्रायः हो गया है। रागनीयों एवं भजनों से निकलने वाली स्वर - लहरियां एक स्वपन सा दिखने लगी है। घडवा, ढोलकी, बैंजू जैसे नामी - गिरामी वाद्यंयन्त्र मौन हों गए है। यहां की स्त्रियां लोक गीतों के अजस्त्र-स्त्रोत कही जंां सकती है। विवाह-उत्सव हो या कोई तीज त्यौहार लोकगीतों की छटा जहां लोक संस्कृति को चमत्कृत करती है वहीं सामाजिक रिश्तों में भी मधुर सम्बंध स्थापित करती है। आओ! हम सब अपनी जीवन प्रक्रिया के उस माटी की गंध को पहचाने इस पवित्र धरती के कण-कण को नमन करे। हरियाणवी लोक गीतों में पारिवारिक सम्बधों के खटटे मिटठे अनुभव आचार के मुरब्बे की तरह कुछ खटटे कुछ मीठे एवम कुछ चरचरे पन का अहसास दिलाते है। हम लोकगीतों में ऐसी ही झलक पा सकते है। |
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| Keywords | ||
| हरियाणवी संगीत घडवा, ढोलकी, बैंजू | ||
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