संप्रेषण’ पत्रिका में संस्मरण विधा’
| Vol-3 | Issue-02 | February 2018 | Published Online: 28 February 2018 PDF ( 107 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| उर्मिला कुमारी यादव 1 | ||
|
1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविधालय, जयपुर। |
||
| Abstract | ||
नवीन अद्यतन गद्य विधाओं में संस्मरण एक स्वतंत्र अस्तित्व है। संस्मरण क¢ अन्तर्गत हमारी संवेदना को बीच भूमि मिलती है, अतीत एवं वर्तमान की क्रिया-प्रतिक्रिया का संतुलित समन्वय संस्मरण में देखने को मिलता है संस्मरण क¢ दायरें पर विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि संस्मरण का विस्तार अधिक है। जहाँ विषय-वस्तु की बात है तो इस संदर्भ में संस्मरण की सफलता सबसे अधिक है। संस्मरण में लेखक अपने जीवन एवं आस-पास क¢ वातावरण को रेखांकित करते हुए अपनी स्मृतियों का परिष्कारण करता है। संस्मरण में घटना क¢ विशेषीकरण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है जिसमें एक काल-विशेष में घटित होने वाली घटनाओं को लेखनी क¢ माध्यम से उक¢रा जाता है। डाॅ. रामस्वरूप चतुर्वेदी क¢ शब्दों में “संस्मरण व्यक्ति को गत्यात्मक रूप में प्रस्तुत करना चाहता हैं, व्यक्ति क¢ अतिरिक्त बाह्य घटनाओं को भी महत्व देता है। इसलिए सामान्यतः संस्मरण का पात्र विशिष्ट घटनाओं को भी संभव करने वाला कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति होगा।”1 |
||
| Keywords | ||
| समन्वय, परिष्कारण, उद्यतन, अस्तित्व, व्यष्टि, समष्टि,आत्मवक्तव्य, विस्तीर्ण, निश्छलता, समरसता, चैपाल, आक्रोश, पग, इण, सुस्ताणी, पुश्तैनी, समकालीनता, दस्तकारी, माक्र्सवादी, मुरीद, नज़म। | ||
|
Statistics
Article View: 191
|
||

