शिवप्रसाद सिंह का कथा साहित्य: सामान्य विश्लेषण
| Vol-3 | Issue-02 | February 2018 | Published Online: 28 February 2018 | ||
| Author(s) | ||
| कमलेश चौधरी 1 | ||
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1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.) |
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| Abstract | ||
कथाकार डाॅ0 शिवप्रसाद सिंह जब रचना-कर्म से जुटते है तो भारतीय सामाजिक संरचना के मूल आधार में जो गाँव हैं, उनसे सम्बद्ध हो अपना पहला उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरणी’ लिखते है। जहां स्वातत्र्योत्तर ग्रामीण परिवेश में सामन्ती ढ़ांचा जीर्णशीर्ण हो टूटता है, मूल्य मान्यताओं में विकृतियाँ आती है, उन्हें स्वयं कथाकार ने देखा-भोगा भी है। साथ ही गांव में शिक्षा-दीक्षा पूंजीवादी संस्कृति का प्रवेश होता है। शहर के संपर्क में आने के कारण गांव के जीवन में नयी हलचल, परिवर्तन आता है। टूटते-बिखरते गांव की सामूहिक संस्कृति का ह्यस होता है। पुरानी मूल्य मान्यतायें टूटती है, नये मूल्य बन नहीं पाते। स्वस्थ मूल्यों के निर्मित न हो पाने की स्थितियों, विकृति परिवेश और सामाजिक परिदृश्य में आये बदलाव को रचनाकार उनकी गतिशीलता में पूरी जीवन्तता के साथ पकड़ने की कोशिश करता है। युगीन यथार्थ के तीखे तेवर इस उपन्यास में विद्यमान है। आजादी मिलने के बाद उत्तरोत्तर बढ़ती टूटन, उखड़न, चटकन का बारीक चित्र है। |
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| Keywords | ||
| टूटन, उखड़न, चटकन, टूटते-बिखरते गांव, स्वातत्र्योत्तर, जीर्णशीर्ण, देखा-भोगा, शिक्षा-दीक्षा, हलचल। | ||
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