वैदिक साहित्य में ज्योतिष शास्त्र
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019 PDF ( 118 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाॅ0 मुकेश शर्मा 1 | ||
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1प्राध्यापक, संस्कृत विभाग, डी.ए.वी. काॅलेज पफाॅर गल्र्ज, यमुनानगर; हरियाणा |
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| Abstract | ||
भारतीय ज्योतिष शास्त्रा का मूल वैदिक साहित्य में उपलब्ध् है। ज्योतिष शास्त्रा विषयक तत्त्व-तिथि, वार, नक्षत्रा , अयन, पक्ष एवं मासादि का प्राथमिक ज्ञान हमें वेदों में प्राप्त होता है। ज्योतिष शास्त्रा का जन्म सृष्टि उत्पत्ति के साथ ही हुआ तथा भारतीय )षियों ने इस पवित्रा शास्त्रा को ईश्वरीय कृपा से आविष्कृत किया और अपनी मेध से प्रवृ( किया। आज हमारे समक्ष त्रिस्कन्ध् ज्योतिष का जो विकसित, परिवधर््ित रूप उपलब्ध् है, वह )षियों की हमें देन है। )ग्वेद में कृत, त्रोता, द्वापर एवं कलियुग का वर्णन उपलब्ध् है, जिसकी वर्तमान में भी गणना प्राप्त होती है। वर्ष का परिचायक सम्वत्सर भी )ग्वेद में उल्लिखित है। तैत्तिरीय संहिता में उत्तरायण एवं दक्षिणायन के अनुरूप अयन शब्द का प्रयोग है। अथर्ववेद में षड्)तु का स्पष्ट उल्लेख आता है। चान्द्रमास का उल्लेख स्पष्ट रूप से संहिता ग्रन्थों में उपलब्ध् होता है। नवग्रह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से वैदिक साहित्य में अपना स्थान बनाए हुए है। नक्षत्रो का नाम वेदों में स्पष्ट रूप से लिखित है जो राशिचक्र का सूक्ष्म विभाजन है परन्तु स्पष्ट रूप से वर्तमान उपलब्ध् वैदिक साहित्य में राशियों के नाम दृष्टिगोचर नहीं होते। त्रिस्कन्ध् ज्योतिष के विविध् पक्षों की वैदिक साहित्य में उपलब्ध् िइसकी प्राचीनता की द्योतक है। |
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| Keywords | ||
| कृत, त्रोता, द्वापर एवं कलियुग | ||
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