वर्तमान शिक्षा एवं शिक्षण संस्थानों के प्रति श्रीलाल शुक्ल की सम्यक चेतना
| Vol-4 | Issue-7 | July 2019 | Published Online: 15 July 2019 PDF ( 111 KB ) | ||
| Author(s) | ||
डा0 अनुपम कुमार
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1शिक्षा व्यवस्था, शिक्षण संस्थान, रिसर्च, इतिहास, अध्यापन और अध्यापक, निजी संस्थान। |
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| Abstract | ||
किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था में वहाँ की राष्ट्रीय चेतना की आत्मा का वास होता है। शिक्षा, जो मनुष्य को संस्कार देती है, वर्तमान समय में काफी महंगी हो चली है। अच्छे शिक्षण संस्थानों में भावी नेतृत्व विकसित होता है, लेकिन स्वातंत्रयोत्तर भारत में इन संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करना आम लोगों के लिए संभव नहीं रह गया है। स्वातंत्रयोत्तर भारत में शिक्षा के स्तर पर ग्रामीण एवं नगरीय परिवेश का भेद रहा है। परिवेश के साथ-साथ हमारी शिक्षा पद्धति भी भेद उत्पन्न कर देती है, क्योंकि उसका न तो आज-तक कोई सुनिश्चित मानदंड बन सका है और न उसमें प्रयोग के स्तर पर किए गए परिवर्तन क्रांतिकारी सिद्ध हो सके हैं। प्रयोग और त्रुटिपूर्ण सुझावों की भीड़ में अपनी शिक्षा पद्धति को धिक्कारते हुए शुक्ल ने कहा है कि ‘‘वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।’’1 यह बात सत्य है कि पिष्टपेषण और पुनरावृत्ति से शिक्षा प्रणाली, अनुपयुक्त और नकारा होती जा रही है। इसके पीछे मूल कारण गुटबाजी, राजनीति और छल-प्रपंच है। ये शिक्षा की सफलता की राह के अवरोधक बने हुए हैं। जीवन को अपेक्षित स्तर की ओर उन्मुख करने में असमर्थ यह शिक्षा प्रणाली वर्तमान शिक्षित युवावर्ग में पलायनवादी मनोवृत्ति को जन्म देती है। जिसे शुक्ल ने अपनी रचनाओं में जगह-जगह लक्षित किया है। |
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| Keywords | ||
| शिक्षा व्यवस्था, शिक्षण संस्थान, रिसर्च, इतिहास, अध्यापन और अध्यापक, निजी संस्थान। | ||
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