लोकमन से उपजे लोकगीत
| Vol-2 | Issue-1 | January 2017 | Published Online: 19 January 2017 PDF | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Rekha Mishra 1 | ||
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1Lecture (Hindi) Government College, Newai (Tonk), Rajasthan |
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| Abstract | ||
लोकगीत किसी समाज की सामूहिक चेतना, भावनाओं और जीवनानुभवों की सहज अभिव्यक्ति हैं। ये गीत किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं होते, बल्कि लोकमन की गहराइयों से उपजकर पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से जीवित रहते हैं। लोकगीतों में उस समाज के लोगों की खुशियाँ, दुख, आशाएँ, आकांक्षाएँ, आस्था और जीवन की विविध स्थितियाँ स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होती हैं। लोकमन से उपजे लोकगीत न केवल कला का स्वरूप हैं, बल्कि वे सामाजिक इतिहास, संस्कृति, परंपरा और जनजीवन के जीवंत दस्तावेज़ भी हैं। इनमें लोकजीवन की सरलता, भावनात्मक गहराई, सामूहिक एकता और प्राकृतिक परिवेश के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता है। चाहे वह श्रमगीत हों, विवाहगीत, सोहर, बिरहा, सावन-भादों के गीत हों या पर्व-त्योहारों पर गाए जाने वाले लोकगीत — सभी में लोकमानस की संवेदनाएँ, उसके संघर्ष और जीवन-दर्शन का सच्चा चित्र उपस्थित रहता है। लोकगीतों में भाषा और भाव दोनों में एक स्वाभाविकता और आत्मीयता होती है। इन गीतों का कोई निर्धारित व्याकरण या नियम नहीं होता, बल्कि ये लोक की बोली, लय और संस्कृति के साथ घुलमिलकर विकसित होते हैं। यही कारण है कि लोकगीत किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। |
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| Keywords | ||
| लोकमन, लोकगीत, लोकसंस्कृति, सामूहिक चेतना, मौखिक परंपरा, लोकजीवन, सांस्कृतिक पहचान। | ||
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