राष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था हेतु नैतिकता, सामाजिकता व संस्कारों से परिपूर्ण शिक्षा नीति की आवश्यकता

Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019    PDF ( 138 KB )
Author(s)
डाॅ. कमला 1

1(शिक्षा शास्त्र)

Abstract

शिक्षा नीतियां किसी भी देश के मूलभूत विकास का आधार होती हैं। शिक्षा वो जो समग्र ज्ञान के साथ आपको जीवन को बेहतर तरीके से जीने का नजरिया प्रदान करे, शिक्षा वो जो आपके विकास के साथ देश के विकास में भी सहयोगी साबित हो, वो जो एक बेहतर समाज गढे़, वो जो एक श्रेष्ठ राष्ट्र की परिकल्पना पर भी खरी उतरे। भारत में आदर्श शिक्षा नीति का इंतजार आज तक हो रहा है क्योंकि अब तक जो भी शिक्षा नीति बनी है या उसमें संशोधन हुए हैं वो तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए उस व्यवस्था को बेहतर बनाने और सुचारु तौर पर संचालित करने की मंशा को बल देती हुई नजर आती हैं। यहां शिक्षा सुधार की गति अपेक्षित नहीं थी। यह सच है कि भारत में शिक्षा का पहला स्कूल ‘घर और परिवार’ होता है लेकिन मौजूदा हालात में देखें तो संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और एकल परिवार उसकी जगह ले रहे हैं, ऐसे में शिक्षा की वो पहली पायदान ही अब अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पा रही है। एकल परिवार अपनी जिम्मेदारियों और भौतिक सुखों की दौड़ में शामिल हैं ऐसे में शिक्षा का घरेलू अध्याय कहीं दरक रहा है, घर के शब्द, माहौल, देखकर सीखने और सिखाने का जज्बा अब छिटक सा गया है, हम यदि शिक्षा को लेकर अब पिछड़ रहे हैं तो उसमें आरंभिक शिक्षा के खस्ता हालात और समग्र परिवारों का विघटन अहम कारण है। देश को ठोस शिक्षा नीति की आवश्यकता कल भी महसूस होती थी और आज भी हो रही है बल्कि यूं कहा जाए कि आज गहरी जरुरत में बदल गई है, लेकिन इसे समझने के लिए देश की अब तक की शिक्षा नीतियों के कुछ बिंदू देखने आवश्यक हैं। यहां एक महत्वपूर्ण बात जिस पर चर्चा भी होनी चाहिए कि यदि बीते सालों में समाज का नैतिक पतन हुआ है तो शिक्षा प्रणाली उस दोष से मुक्त नहीं हो सकती है, उसमें गहरे और समयानुसार ठोस बदलाव की आवश्यकता है। समाज का नैतिक पतन बताता है कि शिक्षा प्रणाली समग्र, पूर्णतः सक्षम और सभी पहलूओं को गहराई से छूने वाली नहीं रही। वर्तमान में शिक्षा नीति आनी है और ऐसे में उम्मीदें की जानी चाहिए कि वो उन सभी पक्षों पर मजबूत होगी जहां से समाज का नैतिक विकास जुड़ा होता है। हालांकि 1952 को डॉ. लक्ष्मणस्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में “माध्यमिक शिक्षा आयोग“ की स्थापना की गई थी, उन्ही के नाम पर इसे मुदालियर कमीशन कहा गया’ लेकिन इस आयोग में माध्यमिक शिक्षा के पुर्नगठन को पहले तरजीह दी गई, जबकि यहां बुनियादी शिक्षा पर भी गहराई से मंथन होता तो वर्तमान के हालात कुछ और होते, हालांकि सन् 1964 में भारत की केन्द्रीय सरकार ने डॉ दौलतसिंह कोठारी की अध्यक्षता में स्कूली शिक्षा प्रणाली को नया आकार व नयी दिशा देने के उद्देश्य से एक आयोग का गठन किया गया, यहां अवश्य ही बेसिक शिक्षा पर बहुत गहराई से विचार किया गया था, हालात तब भी चिंतनीय थे और आज भी चिंतनीय हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि 1952 से 1964 के बीच के कालखंड में जहां शिक्षा को बुनियादी स्तर से मजबूती मिल सकती थी वह समय त्रुटिपूर्ण अथवा आंशिक शिक्षानीतियों के कारण हमें नैतिक तौर पर पीछे की ओर धकेल गया, क्योंकि 1964 में कोठारी आयोग ने अपने गहन अध्ययन के बाद जहां सुधार आवश्यक समझा वो बुनियादी शिक्षा ही थी। यह सराहनीय मंथन था।

Keywords
शिक्षा व्यवस्थाए नैतिकता, सामाजिकता
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