मार्कण्डेय की कहानियों में कृषक समाज का स्वरूप: विश्लेषण
| Vol-6 | Issue-02 | February-2021 | Published Online: 14 February 2021 PDF ( 131 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i02.028 | ||
| Author(s) | ||
| Arvind Kumar Sharma 1 | ||
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1Research Scholar, Department of Hindi, University of Rajasthan, Jaipur (Raj.) |
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| Abstract | ||
मार्कण्डेय एक ग्राम कथाकार थे। गांव का किसानी समाज उनका अपना जाना पहचाना समाज है जिसे उन्होंने कई दृष्टियों से देखा और समझा है। उनकी कहानियों में हमें आजादी के बाद के एक विशाल ग्रामीण जीवन एवं किसानी समाज के दर्शन देखने को मिलते है। पच्चास और साठ के दशक राजनीतिक हलचलों से भरे थे। उस दौर में मार्कण्डेय ने ऐसी कहानियाॅ लिखी, जो बताती हैं कि आम किसानों के अन्तर्मन में क्या उमड़-घुमड़ रहा था और वे आधुनिक विकास से अपने सम्पर्क को किस रूप में देख रहे थे। उनकी कहानियों में कृषकों के बाहरी संघर्ष के साथ ही साथ उनके भीतर के संघर्ष भी उभर कर सामने आये। उनकी कहानियों में कृषक समाज अपने तमाम तरह के अन्तर्विरोधों के साथ उपस्थित है। मार्कण्डेय का जीवन गांव की मिट्टी से जुड़ा था। इसलिए उन्होंने इस समाज को अलग से नहीं बल्कि भारतीय समय, समाज एवं राजनीति के साथ विश्लेषित किया है। भारत में आधुनिकीकरण के फलस्वरूप किसानों का जीवन अभाव एवं कठिन संघर्षों से गुजर रहा था, किसान सहसा बहुत अलग-अलग हो गये थे ऐसे में मार्कण्डेय ने अपनी कहानियों में इन परिस्थितियों का सच्चाई से चित्रण ही नहीं किया, बल्कि भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में किसानों का महत्व दिखाते हुए उनके अधिकारों के लिए लड़ाई भी लड़ी है। उन्होंने अपनी कहानियों में निरूत्तर कर देने वाली स्पष्टवादिता से उन परिस्थितियों का जिक्र किया है जो भूमिहीन या यूं कहंे कि छोटी भूमि वाले किसानों की गरीब जिन्दगी में एक लम्बे समय से चली आ रही है। |
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| Keywords | ||
| ग्रामीण जीवन, आर्थिक परिवेश, सामाजिक असमानता, आर्थिक जीवन। | ||
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