मन्नू भण्डारी के उपन्यासें में सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न रूपों का चित्रण, उपलब्धियाॅ एवं सीमाएँ

25 May 2019    PDF ( 196 KB )
Author(s)
लक्ष्मीदेवी 1; डॉ. ब्रजलता शर्मा 2

1पीएचडी शोध छात्रा, हिंदी विभाग, हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय,पौढ़ी, उत्तराखण्ड

2सह - आचार्य, हिंदी विभाग, हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय, पौढ़ी, उत्तराखण्ड

Abstract

स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी उपन्यास लेखिकाओं में मन्नू भण्डारी का नाम शीर्ष स्थानीय है।सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना का जो स्वस्थ एवं प्रखर रूप मन्नू भण्डारी के उपन्यासों में व्यक्त हुआ है, वह आज तक अन्यत्र दुर्लभ है। राजनीति,सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक विद्र्रूपताओं से ग्रस्त समाज का यथातथ्य वर्णन प्रस्तुत करने में मन्नू जी सर्वथा समर्थ सिद्ध हुई हैं। ’महाभोज’ ’आपका बन्टी’, स्वामी तथा कलवा’ उनकी औपन्यासिक कृतियाॅ हैं। महाभोज उपन्यास एक हरिजन युवक की निर्मम हत्या और उससे बनने वाले परिवेश का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करता है। साथ ही साथ समसामयिक राजनीतिक माहोल की दुविधापूर्ण झकझोर देने वाली सच्चाई का भी चित्रण करता है। गरीबों के लिए झूठे आॅसू बहाने में निपुण मगरमच्छनुमा नेताओं द्वारा लगाये जाने वाले खोखलों नारों के कुत्सित षडयंत्रों और दमघोटू स्थितियों का अटल निर्भीकता के साथ चित्रण किया गया है। है। इस दृष्टि से मन्नू भण्डारी का यह उपन्यास अत्यन्त सशक्त है। अपने
समर्पण में ही लेखिका ने सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना की प्रखर अभिव्यक्ति की है। ’’दुर्निवार सम्मोहन भरी उस खतरनाक लपकती अग्नि लीक लिए जो बिसू और बिन्दा तक ही नहीं रूकी रहती ......................... । मन्नू
भण्डारी की सजग लेखनी ने सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं को वाणी दी है। आज की ज्वलन्त सामाजिक समस्याएॅ राजनीति से जुड़ी हैं। लेखिका ने अभिनिवेशपूर्वक राजनीति के गिरगिटी चरित्र को उजागर किया है। ’’आज का भारतीय जीवन एक अभूतपूर्व मूल्यहीनता, अर्थहीनता और सड़ॅाध का शिकार हो गया है। मन्नू भण्डारी ने महाभोज में इस सड़ाॅध का प्रत्ययकारी और मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।’’
मन्नू भण्डारी ने समाज के निर्बल के प्रति अपनी वैचारिक सहानुभूति प्रकट की है,जो उनकी प्रखर सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना का द्योतक है दलित समस्या को यथार्थ मनोवैज्ञानिक धरातल पर रख कर उसका हृद्यस्पर्शी चित्रण लेखिका ने साफल्यपूर्वक किया है।
नारी हमारे समाज की मुख्य घटक है। उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करके ही समाज उन्नति कर सकता है। किन्तु व्यैक्तिक स्वतंत्रता और अह ंके कारण सामंजस्य असंभव है। स्त्री पुरूष जब परिवार में प्रेम पूर्वक रहतेे हैं तो एक स्वर्गीय वातावरण का निर्माण करते हैं। किन्तु यही परिवार जब विघटित होने लगता है तब वह अभिशप्त होकर नारकीय यातना के दौर से गुजरने लगता है। व्यक्ति मन की टूटन को सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्या का रूप लेखिका ने दिया है।माता-पिता के अपसी संघर्ष में सन्तान का कोई दोष नहीं होता,फिर भी सबसे अधिक पी़ड़ा का भाजन वही बनता है। यद्यपि लेखिका ने अपने औपन्यासिक कृतित्व द्वारा सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं को उजागर किया है। किन्तु कतिपय पात्रों की विश्वसनीयता संदेहास्पद हो उठती है। अक्सर छोटे कथानक को अधिक विस्तार दिया गया है। कतिपय विद्वानों का ऐसा मानना है। सार रूप में मन्नू भण्डारी की सामाजि एवं सांस्कृतिक चेतना का स्वर प्रेरक और सामयिक है।

Keywords
अन्यत्र-अन्य कहीं , दुर्लभ- कठिन , विद्रूपता- कठिनाई , मूल्यहीनता- मूल्य से रहित , मर्मस्पर्शी- संवेदनशील , द्योतक-परिचायक , घटक- अवयव, तत्व , भाजन- पात्र, कतिपय- कुछ ।
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