भारत की बदलती विदेशी नीति (लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट की और)
| Vol-5 | Issue-6 | June-2020 | Published Online: 15 June 2020 PDF ( 192 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i06.014 | ||
| Author(s) | ||
डाॅ. चन्द्रदीप नंदलाल यादव
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1राजनीति विज्ञान विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
सामान्य शब्दों में विदेश नीति एक प्रक्रिया है। जिसमें कोई देश अपने हितों की सुरक्षा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों के साथ संबंध बनाते हुए करता है इसके लिए वह अन्य राज्यों के व्यवहार को बदलने तथा अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में अपनी गतिविधियों को साम,दाम, दंड, एवं भेद के आधार पर संचालित करता है। भारत का सांस्कृतिक अतीत अत्यन्त गौरवमय रहा है। यह न केवल पड़ौसी देशों के साथ अपितु दूर-दूर स्थित देशों के साथ भी सांस्कृतिक एवं व्यापारिक आदान-प्रदान करता रहा है। भारत की विदेश नीति के निर्माण में भी उन्हीें तत्वों का प्रभाव पड़ा है जो अन्य देशेां की विदेशी नीतियों के निर्धारण में प्रभाव डालते हैं ऐसे तत्वों में कुछ स्थिर होते हैं है कि भारत की विदेश नीति का उसके आवश्यक परिवेशों में मूल रूप से विदेश नीति की जड़े अद्वितीय ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि राजनीतिक संस्थाओं, परम्पराओं, आर्थिक आवश्यकताओं, शक्ति कारकों, आकांक्षाओं विचित्र भौगोलिक परिस्थितियों और राष्ट्र के मान्य आधारभूत मूल्यों में पायी जाती है। बंदोपध्याय के अनुसार ’’भूगोल, आर्थिक विकास, राजनीतिक परम्पराएं, सैन्य शक्ति, आन्तरिक और बाह्य संबंध और राष्ट्रीय चरित्र का मुख्य कारक मानते हैं। अतः विदेश नीति के संघटकों पर विहंगम दृष्टि डालना ही उचित है। इस वस्तुनिष्ट मूल्याकंन के पश्चात् बनी विदेश नीति सफल होती है। प्रकारांतर में कहा जा सकता हैैै कि किसी देश की विदेश नीति की सफलता उसके निर्धारक तत्वों की वस्तुनिष्ट मूल्यांकन पर ही निर्भर करती है। जहाँ तक इन तत्वों की तुलनात्मक महत्ता का प्रश्न है, यह महत्ता समय काल और परिस्थिति के बदलते परिप्रेक्ष्य में घटती-बढ़ती रहती है। |
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| Keywords | ||
| भौगोलिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक परम्पराएं, सैन्य शक्ति, बाह्य संबंध, विहंगम दृष्टि | ||
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