जाॅन राॅल्स का न्याय सिद्धान्त
| Vol-4 | Issue-12 | December 2019 | Published Online: 16 December 2019 PDF ( 115 KB ) | ||
| Author(s) | ||
जितेन्द्र कुमार वर्मा
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1शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
19वीं सदी में उपयोगितावाद के विकास व विस्तार के बाद एंगलों अमेरिकन दर्षन की प्रगति रूक गयी थी। इस 20वीं षदी में जाॅन राॅल्स ने पुनर्जीवित किया है। राॅल्स ने लाॅक, रूसो व कांट के सामाजिक समझौते की परम्परा को संशोधित करके इस अनुषासन को फिर से पुनर्जीवित किया है। उनके लेखों की श्रृंखला का प्रारम्भ ’न्याय उचिचता के रूप में’ (1958) से और समापन ए थियरी आॅफ जस्टिस (1973) से हुआ है। न्याय का यह सिद्धांत वैध राजनीतिक सत्ता के द्वारा एक नयी रूपरेखा के आरम्भ से निर्धारित होता है। इसका राॅल्स ने दूसरी पुस्तक पाॅलिटिकल लिबरलिज्म में निष्चित सूत्रीकरण किया है। राॅल्स ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में न्याय पर एक महत्वपूर्ण मोनोग्राफ प्रदान किया है। (राॅल्स 1999) राॅल्स की उपलब्धियां सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर बहस की समकालीन षर्ते निर्धारित करती है। राॅल्स के न्याय सिद्धांत में एक समतावादी दृष्टि निहित है जो दो न्याय सिद्धांतों, मूल स्थिति, तुलना और न्याय सिद्धांत के औचित्य के लिए एक विधि को षामिल करती है। इसमें स्वतंत्रता व समानता के मूल्य को एक संकल्पना में समाहित किया गया है। स्वतंत्रता को प्राथमिकता देने के कारण समानता के भेद से इसका विवाद भी है। इसमें स्वीकार किया गया है कि स्वतंत्र व समान व्यक्ति सामाजिक सहयोग के लिए इन सिद्धांतों का स्वीकार करेंगे। |
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| Keywords | ||
| उचितता, सद्गुण, न्याय | ||
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