छत्तीसगढ़ राज्य में आदिवासियों का विकास और विस्थापन: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Vol-3 | Issue-10 | October 2018 | Published Online: 10 October 2018    PDF ( 325 KB )
DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.1470737
Author(s)
मोहम्मद आमिर पाशा 1
Abstract

भारतीय समाज में आज आदिवासियों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। विस्थापन के कारण उन्हे अपने बसे-बसाए, घर-दालान, गाँव, लोग इत्यादि को छोडकर जाना पड़ता है। दुनिया को केवल भौतिक विस्थापन ही नज़र आता है। परंतु एक आदिवासी अपने मन, अपने जीवन, संस्कृति और सभ्यता से भी विस्थापित होता है। आदिवासी केवल जल, जंगल और ज़मीन तक ही सीमित नही है बल्कि ये मूल भारतीय भारत की पृष्टभूमि को विश्व पटल पर भी प्रस्तुत करते हैं, परंतु विडम्बना ये है कि जो देश के मूल निवासियों के वंशज अब केवल 8 प्रतिशत ही बचे हैं। इनकी स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। वहीं आदिवासियों की मूलभूत सुविधा ही प्रदान करने में सरकार असमर्थ दिख रही है। यह हालात और भी दयनीय हो जाते हैं जब विकास के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन किया जाता है। भारत में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर आदिवासी सबसे कमजोर और वंचित लोगों की श्रेणी में आते हैं और विस्थापित भी यही आदिवासी होते हैं परंतु विकास का अल्प लाभ भी इन्हे प्राप्त नही होता। विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले लोगों की कुल संख्या में अनुसूचित जनजाति के लोगों की तादाद 40 प्रतिशत है। परंतु इन्हे सड़क, यातायात, बिजली, पेयजल, संचार और स्वस्थ सेवा आदि आधारभूत सुविधा से प्रायः ये वंचित ही रहते हैं।इस शोध पत्र में छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विस्थापन का अध्ययन करेंगे साथ-साथ विस्थापन के कारण का भी पता लगाने का प्रयास किया जाएगा। ज़्यादातर आदिवासी विकास के लिए तैयार की गई योजनाओं के अंतर्गत विस्थापित हुए हैं। परंतु विकास की स्थिति क्या है और यह विकास किसके लिए है। यह बता पाना मुश्किल है। इस शोध पत्र में विस्थापन के उद्देश की कितनी पूर्ति छत्तीसगढ़ राज्य में हुई है इसका भी अध्ययन करेंगे। शोध पत्र पूर्णतः द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है। द्वितीयक स्रोत में समाचार पत्र-पत्रिका, सरकारी आंकड़े, आरटीआई, संसद की रिपोर्ट और विभिन्न ब्लॉग और वैबसाइट आदि।

Keywords
आदिवासी, विस्थापन, विकास
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