गांधीः संपोषणीय विकास के प्रणेता

Vol-6 | Issue-04 | April-2021 | Published Online: 15 April 2021 PDF
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i04.026
Author(s)
राहुल कुमार 1

1सहायक प्राध्यापक, अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग, रामाधीन महाविद्यालय, शेखपुरा मुंगेर विश्वविघालय मुंगेर

Abstract

मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है और विकास उसका मूल स्वभाव है । पाषाण युग से लेकर ऑटोमेशन युग तक के इस संपूर्ण यात्रा में मनुष्य आज जिस दोराहे पर खड़ा है वह विकास यात्रा में पहले कभी नहीं मिला था । इस दोराहे पर मानव के समक्ष अपने अस्तित्व के स्थाई आधार पर्यावरण को बचाने की चुनौती आ खड़ी हुई है । इस चुनौती से निपटने के लिए विकास पथ की समीक्षा सबसे आवश्यक घटक है और इसी समीक्षा के क्रम में पश्चिम में संपोषणीय विकास की अवधारणा का जन्म हुआ । वस्तुतः 1980 के दशक में ब्रुन्टलैंड कमीशन ने भविष्य की संभावनाओं को जीवित रखते हुए वर्तमान की विकास प्रक्रिया को संतुलित करने की बात कही जिसे संपोषणीय विकास का नाम दिया गया। भारतीय मनीषा और दर्शन में यह धारणा पुरातन और सनातन है फिर भी यदि आधुनिक तौर पर देखा जाए तो ब्रुन्टलैंड कमीशन और पर्यावरण संकट से बहुत पूर्व ही गांधीजी ने संपोषणीय विकास की अवधारणा को वास्तविक अर्थ में परिभाषित कर दिया था और इस रूप में उन्हें संपोषणीय विकास का प्रणेता कहा जाना उचित प्रतीत होता है। भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को संपोषणीय विकास की अवधारणा के प्रणेता कहे जाने का आधार यह भी है कि उन्होंने पर्यावरण संकट को समय से बहुत पहले ही पहचान लिया था और पर्यावरण संकट के लिए जिम्मेदार लालच और अत्यधिक दोहन से मानवता को आगाह किया था। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने मानव जाति को आने वाली पीढ़ी के प्रति उत्तरदायी रहने और कर्तव्य भाव से संसाधनों का उपयोग करते हुए आने वाली पीढ़ी के अधिकारों को ध्यान में रखने का मार्गदर्शन दिया था। गांधीजी के शब्दों मेंष् यह पृथ्वी संपूर्ण मानवता की आवश्यकता तो पूरी कर सकती है किंतु किसी व्यक्ति के लालच को नहीं ष्। इसी प्रकार उन्होंने कहा था की ष्वर्तमान पीढ़ी को यह प्राकृतिक संसाधन उनके पूर्वजों से उपहार में प्राप्त नहीं हुआ है बल्कि यह आने वाली पीढ़ी के लिए कर्ज रूप में है। गांधीजी के इन दोनों ही कथनों में संपोषणीय विकास का वास्तविक स्वरूप निहित है। आवश्यकता और लालच में भेद स्थापित करते हुए गांधीजी ने विकास की प्रक्रिया को नैतिकता से जोड़ने का कार्य किया है जो संपोषणीय विकास की वर्तमान प्रचलित पश्चिमी अवधारणा से व्यापक जान पड़ता है और इसे संपोषणीय विकास के स्थान पर संपोषणीय प्रगति कहना अधिक उचित प्रतीत होता है। वर्तमान प्रचलित संपोषणीय विकास की अवधारणा इकोनॉमिक्स एवं इकोलॉजी में समायोजन की वकालत तो करता है किंतु एथिक्स की अवधारणा उसमें शामिल नहीं है जबकि स्थाई और निरंतर चलने वाली अर्थव्यवस्था मानव द्वारा तभी हासिल हो सकती है जब मानव नैतिकता के पथ का वरण करें। इसी प्रकार वर्तमान पीढ़ी के कर्तव्य और भावी पीढ़ी के अधिकार का समायोजन करते हुए गांधीजी ने स्थाई अर्थव्यवस्था के रूप में पर्यावरण को पहचाना है।

Keywords
संपोषणीय विकास, पर्यावरण संकट, उपनिवेशवाद, क्षेत्रवाद, राष्ट्रवाद, वहनीयता, सनातन परंपरा, औद्योगिक क्रान्ति, उपभोक्तावाद
Statistics
Article View: 167