गांधी चिंतन में निहित वैश्विक दृष्टि
| Vol-4 | Issue-5 | May 2019 | Published Online: 25 May 2019 PDF ( 217 KB ) | ||
| Author(s) | ||
मिश्रा अर्चना
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1एसोसिएट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, एस. एस. डी. पी. सी. महिला पी. जी. कालेज रूड़की, हरिद्वार, उत्तराखंड |
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| Abstract | ||
महात्मा गांधी का विलक्षण व्यक्तित्व और विचार आज लगभग एक शताब्दी के बाद भी वर्तमान विश्व में अपनी उपादेयता बनाए हुए हैं। किसी भी वैचारिक दार्शनिक चिंतन की उपयोगिता इस बात पर निर्भर है कि मानव जगत की व्यावहारिक समस्याओं के निराकरण में वह किस सीमा तक सक्षम है। इस दृष्टिकोण से देखें तो गांधी चिंतन में निहित दृष्टि एवं विचार देश और काल की सीमाओं से परे एक सार्वभौमिक चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने एक युद्ध रहित विश्व, जाति व वर्ग रहित प्रचुरता एवं समृद्धि युक्त समाज, बंधुआ मजदूरी व शोषण से मुक्त खेत-कारखाने, समाजोपयोगी सार्वभौम शिक्षा और प्रकृति के सिद्धांतों पर आधारित आर्थिक व्यवस्था का स्वप्न देखा था। राजनीति, समाज शास्त्र, अर्थ शास्त्र आदि मानव जीवन का कोई भी पहलू उनके चिंतन से अछूता नहीं रहा। गांधी के 150 वर्षों बाद भी उनके विचार वर्तमान विश्व की अनेक समस्याओं के संदर्भ में प्रासंगिक हैं। वस्तुतः इन तमाम वर्षों में व्याख्या- पुर्नव्याख्या की लगातार चलती प्रक्रिया से गुजर कर विश्व में उनके विचारों की स्वीकार्यता निरंतर बढ़ी है। |
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| Keywords | ||
| सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, सामाजिक न्याय, सतत विकास। | ||
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