ऋग्वैद के सन्दर्भ में -ज्योतिष् विज्ञान
| Vol-4 | Issue-12 | December 2019 | Published Online: 16 December 2019 PDF ( 167 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| मीनाक्षी सैनी 1; डाॅ. सहदेव शास्त्री 2 | ||
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1शोधछात्रा स.ध.राजकीय पी.जी. महाविद्यालय, ब्यावर, अजमेर (राज.) 2शोध निर्देशक स.ध.राजकीय पी.जी. महाविद्यालय, ब्यावर, अजमेर (राज.) |
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| Abstract | ||
महर्षि दयानन्द के ‘‘ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका‘‘ नामक वर्णित ग्रन्थ में वर्णित है कि वेदमंत्रों के त्रिप्रकारेण अर्थ किये जा सकते हैं- आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक। महर्षि दयानन्द ही नहीं अपितु उन सभी वेदवेत्ताओं, जिन्होनें पक्षपातहीन होकर, साम्प्रदायिकता से ऊपर उठकर एवं श्रद्धाभावेन तटस्थ होकर वैदिक वाङ्मय का मंथन चिंतन आलोडन किया है, का कहना है कि वेद आधिभौतिक ज्ञानोन्नति की चरमसीमा है, आधिदैविक अभ्युदय की पराकाष्ठा है और आध्यात्मिक उन्नयन का चूडान्त रूप है परन्तु वैदिक साहित्य का विहंगम अध्ययन करने से विदित होता है कि वैदिक मंत्रो के अधिकांशतः आध्यात्मिक भाष्य ही हुए हैं। सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द ने वेदों में सब विद्याओं के होने के कारण यह ज्योतिष् का भी मूल है, यह मानते हुए वैदिक ऋचाओं का आधिदैवत् अर्थ करते हुए अपने ग्रन्थ में पृथिव्यादिलोकभ्रमण, सूर्य प्रकाश से ग्रहोपग्रहों का प्रकाशित होना, सूर्य-चन्द्र ग्रहण, सूर्यादि खगोलीय पिण्डों की आकर्षण शक्ति, गणित विद्या इत्यादि ज्योतिष् विषयक बिन्दुओं पर भाष्य किया है जिनसे वेदों में ज्योतिष् विज्ञान होने के संकेत प्राप्त होते है। ऋग्वैदिक ऋचाओं का शोधपरक अध्ययन करने से विदित होता है कि ज्योतिष् विज्ञान बीजरूप में ही यही से संप्रारम्भ हो गया था। सूर्य-पृथिव्यादि खगोलीय पिंडों का गतिमान् होना, स्वप्रकाशमान् परप्रकाशवान् होना, सप्ततारा ऋषिमंडल, ऋतुनिर्माण इत्यादि अनेक ज्योतिष्परक तथ्यों को इंगित करने वाली ऋचाएं ऋग्वेद में मौजूद है जिनका यथा प्रसंग अंकन किया जायेगा। |
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| Keywords | ||
| आधिभौतिक, श्रद्धाभावेन, श्रद्धाभावेन, ग्रहनक्षत्रादि | ||
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