आर्थिक आचार नीति (भारतीय सन्दर्भ में एक अध्ययन)

Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019    PDF ( 208 KB )
Author(s)
डाॅ0 शैलेन्द्र कुमार सिंह 1

1सहा0 आचार्य, अर्थशास्त्र, नेहरू ग्राम भारती मानित् विश्वविद्यालय, प्रयागराज

Abstract

भारतीय आर्थिक चिन्तक वैज्ञानिक न होकर नैतिक एवं व्यवहारिक है, अर्थात् वैज्ञानिक अर्थशास्त्र (Positive Economics) का यहाँ अधिक विकास नहीं हुआ, अर्थनीति (Normative Economics) का ही अधिक विकास हुआ अर्थव्यवस्था कैसी हो, अर्थ के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा हो तथा समाज में अर्थ का क्या रूप हो, इन समस्याओं पर तो बहुत चिन्तन है। परन्तु धन का उत्पादन तथा वितरण सम्बन्धी विचार अधिक नहीं है और जो है भी वे स्पष्ट नहीं है। गाँधी जी के विचार भी इसी विशेषता को लिये हुये हैं। उनका अर्थशास्त्र विज्ञान के रूप में न होकर आदर्श के रूप में ही है। यह आदर्श कोरी कल्पना पर ही आधारित नहीं बल्कि वास्तविकता से सम्बन्धित है। यह आदर्श सम्भव है और उनकी प्राप्ति की जा सकती है मनुष्य और समाज का आर्थिक कारण क्या है? इन कारणों को भले ही न ढूंढा गया हों किंतु मनुष्य और समाज का आर्थिक आचरण कैसा होना चाहिये, इस विषय पर चिन्तकों ने प्रकाश डाला है। भारतीय आर्थिक चिन्तकों ने शोषण और आर्थिक विषमता को सदा ही खराब बताया है। संग्रह को सभी ने बुरा बताया। भारत का आदर्श शेष संसार से भिन्न रहा है। इसकी परम्परा ही भौतिक न होकर आध्यात्मिक एवं नैतिक रही है। प्रचीन नीति का सिद्धांत है- ‘ यो अर्थ-शुचि स शुचिं अर्थात जिसका आर्थिक जीवन शुद्ध है वह शुद्ध है। उत्पादन, वितरण तथा विनिमय आदि आर्थिक क्रियाओं में मनुष्य को ईमानदार, उदार न्यायपूर्ण रहना चाहिए। न तो बेईमानी से किसी धन को लेना चाहिये और न किसी का प्राप्य अपने पास रखना चाहिये।

Keywords
भारतीय, आर्थिक, आर्थिक विषमता, नैतिक
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