‘आखिरी छलांग’ उपन्यास में चित्रित कृषक जीवन
| Vol-6 | Issue-09 | September-2021 | Published Online: 15 September 2021 PDF ( 698 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i09.017 | ||
| Author(s) | ||
शिवाली शर्मा
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1पीएच.डी. शोधार्थी (हिन्दी), सेट, हिन्दी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू - 180006 |
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| Abstract | ||
ग्रामीण समाज और कृषि भारत का अभिन्न अंग हंै। भारतीय किसान कठोर परिश्रम करके भूमि पर कृषि करते हैं, तब जाकर देषवासी अन्न को ग्रहण कर पाते हैं। परन्तु किसानों का जीवन प्रारम्भ से ही संकटों और अभावों से ग्रस्त रहा है क्योंकि इन्हें इनकी फसल की सही कीमत नहीं दी जाती जिससे किसानों के आत्महत्या के आँकड़ें लगातार बढ़ते जा रहे हैं। किसानों को निरन्तर सरकार, विचैलियों और प्राकृतिक आपदाओं के साथ जूझना पड़ता है। निरक्षरता और निर्धनता के कारण ऋण के बोझ से दबा कुचला किसान वर्ग गजदूर बनने को विवष हो जाता है। षिवमूर्ति द्वारा चित्रित उपन्यास ‘आखिरी छलांग’ मे वह ऐसे किसान का उल्लेख करते हैं जिसका सम्पूर्ण जीवन संघर्ष से भरा हुआ है। किसान अपनी जवान बेटी का विवाह कराने में तथा अपने बेटे की पढ़ाई की फीस चुकाने में भी सक्षम नहीं है। छोटी से छोटी जरूरतों की पूर्ति के लिए आए दिन उसे अपने खेत गिरवी रखने पड़ते हैं। परिणामस्वरूप यही ऋण उसके गले का फंदा बन जाता है। उपन्यास का पात्र पहलवान पूरे मनोबल को एकत्रित कर और दृढ़ संकल्पी होकर अपने जीवन की आखिरी छलाँग लगाता है। ताकि वह कुछ प्राप्त कर सके। परन्तु आखिर में भी उसके जीवन में मात्र असफलता का ही आगमन होता है। |
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| Keywords | ||
| निरक्षरता, अभिन्न, निर्धनता, आपदाओं,सक्षम, अभाव, मनोबल, दृढ़ संकल्प। | ||
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