अनुवाद का उद्भव और विकास (हिन्दी साहित्य के विशेष संदर्भ में)
| Vol-5 | Issue-6 | June-2020 | Published Online: 15 June 2020 PDF ( 832 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i06.031 | ||
| Author(s) | ||
| प्रेरणाt 1 | ||
|
1शोधार्थी यू.जी.सी., नेट (हिन्दी) स्नातकोŸार, हिन्दी विभाग ति0माँ0भा0वि0, भागलपुर, 812007 |
||
| Abstract | ||
विश्व साहित्य में अनुवाद चिंतन की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। प्राचीन युग में जहाँ अनुवाद सम्बन्धी कोई सैद्धांतिक एवं समीक्षात्मक चिंतन स्वतंत्र रूप से नहीं किया गया, वहीं आज पूरे विष्व में अनुवाद विषय से सम्बन्धित सभी पक्षों पर एक सुव्यवस्थित ढंग से चिंतन-मनन करने में उत्साहजनक प्रयास किये जा रहे हैं। आज भारत जैसे बहुभावी राष्ट्र में अनुवाद विषय को एक स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता प्राप्त हो चुकी है। संसार में प्रायः दो हजार वर्षो से निरंतर अनुवाद होते रहे हैं। अनुवाद सिद्धांत अनूदित साहित्य के संदर्भ में ही विकसित एवं पल्लवित हुआ है। अतः अनुवाद चिंतन का विकास समझने के लिए हमें अनुवाद साहित्य का विकास समझना होगा। |
||
| Keywords | ||
| लक्षणग्रथ, अनुदित ग्रन्थ, अनुवादक, अनुवाद, न्यू टेस्टामेंट, ओल्ड टेस्टामेंट, गद्यानुवाद, पद्दानुवाद, छायानुवाद, काव्यशास्त्र | ||
|
Statistics
Article View: 552
|
||

