शिक्षा के माध्यम से मनुष्य का सर्वांगीण विकास

Vol-5 | Issue-9 | September-2020 | Published Online: 15 September 2020
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i09.026
Author(s)
डाॅ. हिना चावड़ा 1

1अध्यापिकाः मूल्य शिक्षा एवं मनोवैज्ञानिक परामर्शदात्री, विभागः मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान रायपुर छत्तीसगढ़

Abstract

भारत में वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था अनेक समस्याओं से ग्रस्त है। जहां छात्रों में अनुशासनहीनता देखने को मिलती है, वहीें अध्यापकों में अपने उŸारदायित्वों के प्रति गंभीरता देखने में नहीं आती है। शिक्षा का तात्पर्य मूलतः व्यक्तित्व के समग्र विकास से है। विद्वानों और मनीषियों ने शिक्षा की जो परिभाषाएं दी हैं, उन सबका समन्वित अर्थ व्यक्तित्व का समग्र विकास है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली प्रक्रिया का नाम ही शिक्षा है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली की तुलना प्राचीनकाल में प्रचलित गुरुकुल पद्धति से करते हैं तो उसमें अंतर दिखाई देता है। प्राचीनकाल में गुरु शिष्य के व्यक्तित्व विकास में रुचि लेते थे, वहीं आज अध्यापक व्यावसायिक दृष्टि से छात्रों को पढ़ाते हैं। उनका अध्यापन जीविकोपार्जन का साधन मात्र रहता है। यही कारण है कि आजकल अध्यापकों को अपने छात्रों की उपेक्षा और अवहेलना का शिकार होना पड़ता है। यह सभी गंभीर मुद्दे हैं कि शिक्षा का लक्ष्य सर्वांगीण विकास की ओर संकेत करता है, लेकिन शिक्षा का परिणाम इन लक्ष्यों को फलीभूत करता हुआ दिखाई नहीं देता, क्यों? मनुष्य में समझने-जानने की असीम क्षमता होने के कारण मनुष्य को पशुयोनी से भिन्न एवं विकसित माना गया है। शिक्षा की आवश्यकता मनुष्य को है, इसलिए मनुष्य को जीव-जंतु से विकसित की संज्ञा दी गई है। विकास का आशय ही है समग्रता में पहले से बेहतर व्यवस्था का होना अर्थात् सर्वांगीण विकास। मनुष्य विकसित इकाई है तो समग्रता (स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र, अंतर्राष्ट्र एवं प्रकृति) में धरती पहले से बेहतर के स्थान पर पर्यावरण असंतुलन, प्रदूषण इत्यादि प्राकृतिक समस्याएं एवं मनुष्य-मनुष्य का आपसी संबंधों में भी अविश्वास एवं भय, आंतक की स्थिति चरम सीमा पर है, जिससे यह चिंतन का विषय है कि मनुष्य को विकसित इकाई कहने का आधार क्या हो?

Keywords
शिक्षा, सर्वागिण विकास, मानवीय शिक्षा, मूल्य शिक्षा।
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