हिंदी कविता में पर्यावरणीय चेतना का स्वरूप और अभिव्यक्ति
| Vol-6 | Issue-02 | February-2021 | Published Online: 14 February 2021 PDF | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i02.034 | ||
| Author(s) | ||
| Geetanjali Meena 1 | ||
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1Associate Professor (Hindi), Government college, Chaksu |
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| Abstract | ||
| पर्यावरण मानव जीवन का आधार है तथा जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश जैसे पंचमहाभूतों से समस्त सृष्टि और मानव शरीर का निर्माण हुआ है। भारतीय साहित्य और संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय एवं जीवनदायिनी शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है। हिंदी कविता में भी प्रकृति और पर्यावरण के प्रति गहरी संवेदना प्रारंभ से ही दिखाई देती है। भक्तिकाल के कवियों ने प्रकृति को ईश्वर की सृष्टि मानकर उसके महत्व को रेखांकित किया। रहीम के दोहे “रहिमन पानी राखिए” में जल के महत्व और संरक्षण का संदेश निहित है, जबकि तुलसीदास ने “छिति जल पावक गगन समीरा” के माध्यम से मानव और प्रकृति के अभिन्न संबंध को स्थापित किया है। आधुनिक हिंदी कविता में प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं रह जाती, बल्कि पर्यावरणीय चेतना का सशक्त माध्यम बन जाती है। मैथिलीशरण गुप्त ने चाँदनी रात और प्राकृतिक सौंदर्य का मनोहारी चित्रण किया है, जबकि सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के प्रति अपनी गहन अनुरक्ति व्यक्त करते हैं। जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ में प्रलय के दृश्य के माध्यम से प्रकृति की विराट और विनाशकारी शक्ति का चित्रण करते हुए मानव को प्रकृति से खिलवाड़ न करने की चेतावनी दी है। समकालीन हिंदी कविता में पर्यावरण-विमर्श और अधिक व्यापक तथा प्रखर रूप में सामने आता है। अज्ञेय ने मानव की भोगवादी प्रवृत्ति और प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उत्पन्न पर्यावरणीय संकट की ओर संकेत किया है। दीपक कुमार पाचापोर ने शहरीकरण और विकास के नाम पर वृक्षों की कटाई तथा प्राकृतिक आवासों के विनाश पर चिंता व्यक्त की है। नागार्जुन की कविताओं में नदियों के सूखते अस्तित्व और जल-संकट की त्रासदी दिखाई देती है। नरेश सक्सेना ने नदियों के प्रदूषण और जल-स्रोतों की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण करते हुए आधुनिक सभ्यता की आलोचना की है। गंगा जैसी पवित्र नदी का प्रदूषित स्वरूप मानव की पर्यावरण-विरोधी गतिविधियों का प्रतीक बनकर उभरता है। इस प्रकार हिंदी कविता में पर्यावरण संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन, जल-संरक्षण, वन-संरक्षण तथा प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व की भावना प्रमुख रूप से व्यक्त हुई है। | ||
| Keywords | ||
| पर्यावरण, पर्यावरण विमर्श, प्रकृति, पर्यावरणीय चेतना, नदी, प्रदूषण, हिंदी कविता। | ||
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