पूँजीपति वर्ग का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका
| Vol-3 | Issue-03 | March 2018 | Published Online: 30 March 2018 PDF ( 116 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| अखिलेन्द्र कुमार रंजन 1 | ||
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1शोधार्थी, विश्वविद्यालय इतिहास-विभाग, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा |
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| Abstract | ||
उन्नीसवीं सदी के अंतिम और बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों से भारतीय पूँजीपति वर्ग धीरे-धीरे परिपक्व होने लगे थे और राजनीति मंे भी अपना प्रभुत्त जमाने लगे थे। पहले विश्वयुद्ध के अंत तक, विभिन्न कारणांे से, पंजीकृत ओद्योगिक उद्यमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। किंतु एक विस्तारित सामाजिक आधार से आए भारतीय उद्योगपतियों की नई पीढ़ी अधिक परिपक्व और अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक थी। अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए वे स्वयं को संगठित करने लगे, जिसके परिणामस्वरूप 1887 में बंगाल नेशनल चैंबर आॅफ काॅमर्स आरै 1907 में बंबई मंे इंडियन मर्चेट्स चंैबर का जन्म हुआ। बंबई के व्यापारी समूहांे मंे सौदागर जहाँ अधिक राष्ट्रवादी थे, वहीं उद्योगपति सरकार के परंपरागत सहयोगी थे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जहाँ उद्यागे पति फले-फलूे, वहीं विनिमय दरों के उतार-चढ़ाव और भारी करांे के कारण सौदागरों को हानि पहुँची। |
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| Keywords | ||
| पूँजीपति वर्ग भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन | ||
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