21वीं सदीः भूमंडलीकरण के दौर से गुजरता हुआ भारत
| Vol-3 | Issue-10 | October 2018 | Published Online: 10 October 2018 PDF ( 219 KB ) | ||
| Author(s) | ||
डाॅ. प्रवीण दि. देशमुख
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1सहायक प्राध्यापक एवं हिन्दी विभाग-पमुख गुलाम नबी आजाद कला,वाणिज्य व विज्ञान महाविद्यालय,बार्शिटाकली,जिला-अकोला (महा.) भारत |
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| Abstract | ||
आज का दौर ‘भूमंडलीकरण’ का दौर है। आज का दौर वैश्वीकरण,उदारीकरण,निजीकरण, बाजारीकरण का दौर है। आज हम देखते है कि औद्योगिकरण को अधिक बढ़ावा दिया जा रहा है,साथ ही हम इस बात की ओर भी नजर अंदाज नहीं कर सकते कि खेती भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसके पीछे उद्देश समाज को सुखी एंव सम्पन्न कराना हो सकता है। किन्तु इसके कारण हमें कई कठिनाईयों से तथा समस्याओं से भी गुजरना पड़ता है। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस वैश्वीकरण के इस युग में बनावटी तथा दिखावे को अधिक महत्व मिल रहा है,जिससे चिजों की मौलिकता को खतरा दिखाई दे रहा है। ऐसा होना नहीं चाहिए। क्योंकि किसी भी वस्तु की मौलिकता उसके लिए महत्वपूर्ण होती है। अगर हम उसकी मौलिकता को ही नष्ट करते है तो फिर उसमें केवल दिखावा ही रह जाता है। आज हमारे समक्ष मूलतः औद्योगिकिकरण,बाजारीकरण,निजीकरण के इस युग में भी अपने अस्तित्व को बरकरार रखना एक अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। आज हम वैज्ञानिक तथा तकनिकि क्षेत्र के कारण विकास के पथ पर अग्रसर दिखायी दे रहें है। किन्तु इसी समाज का एक प्रमुख हिस्सा जो आज भी जिस युग में हम अपने आप को आधुनिकिकरण का एक प्रमुख हिस्सा मान बैठे है,ऐसे युग में किसान आज भी परिस्थिति,हालात से तंग आकर खुदखुशी,आत्महत्या करता नजर आ रहा है। जब तक हम इसके तह तक जाकर उस गहराई को नहीं समझेंगे तबतक हमारा आधुनिकिकरण कहना या समझना सही नहीं होगा। व्यवस्था के साथ-साथ गरीब-से-गरीब व्यक्ति भी इसका हिस्सा होना अनिवार्य है,इस विकास में क्रयशील होना आवश्यक है। |
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| Keywords | ||
| भूमंडलीकरण वैश्वीकरणए औद्योगिकिकरण,बाजारीकरण,निजीकरण | ||
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