स्वतंत्रता पूर्व भारत में यूरोपीय शिक्षा का विकास
| Vol-3 | Issue-06 | June 2018 | Published Online: 19 June 2018 PDF ( 1 MB ) | ||
| Author(s) | ||
| परीक्षित लायेक 1; डा. रमेश कुमार 2 | ||
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1प्रस्तोत्रा, शिक्षा विभाग, ओ.पी.जे.एस. विश्वविद्यालय, चुरू, राजस्थान 2निर्देशक, शिक्षा विभाग, ओ.पी.जे.एस. विश्वविद्यालय, चुरू, राजस्थान |
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| Abstract | ||
27 मई 1948 को वास्को-डी-गामा द्वारा भारत पहँुचने के लिए नये समुद्री मार्ग की खोज के परिणाम स्वरूप पूर्तगाली, डच, डेन फ्रेंच और अंग्रेज इस देष में व्यापार के लिए आये और यहाँ अपने पैर जमाने प्रारंभ कर दिये। इनके सामने दो उद्देष्य थे - व्यापार और इसाई धर्म का प्रचार-प्रसार। पादरी तथा मिषनरी कार्य के लिए Theological Training Centre की स्थापना St. Fransis Xavier पहले पादरी थे जिन्होंने धर्म के साथ षिक्षा का प्रचार प्रसार का बीड़ा उठाया। इस काम में St. Loyola भी उनका साथ दे रहे थे। Robert Nobuli 1605 से 1656 तक मद्रास में धर्म प्रचार का कार्य अपने तरीके से करते रहे वे न केवल शुद्ध बल्कि ब्राह्मण तक के पास धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव दिया करते थे। वह बाइबिल को खोया हुआ वेद कहा करते थे। इसका नाम उन्होंने ईषु वेद के रूप में भी दिया। अपना प्रभाव कायम करने के लिए वह साधु, सन्यासियों की तरह भगवा वस्त्र पहनते थे। |
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| Keywords | ||
| वास्को-डी-गामा पादरी तथा मिशनरी | ||
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