सूर्यबाला की कहानियों में अपराधबोध

Vol-3 | Issue-08 | August 2018 | Published Online: 07 August 2018    PDF ( 532 KB )
DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.1344120
Author(s)
सुनील कुमार .एस. यादव 1

1पीएचडी छात्र, उच्छ शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा मद्रास, (धारवाड़ शाखा) धारवाड़ कर्नाटक-०१

Abstract

समकालीन हिंदी साहित्यकारों  में सूर्यबाला जी का नाम  विशिष्टतम हैं वे अपानी रचना के माध्यम से परिवार और समाज के उन प्रश्नों और प्रसंगों पर लेखनी चलाती हैं ।  इसलिए हिंदी साहित्य  जगत में महिला कथाकारों में  कहानीकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार के रूप में सूर्यबाला जी का विशिष्ट स्थान- मान प्राप्त हैं। ऊन्होने उच्च वर्ग से निम्न वर्ग तक लेखनी चलाकर, संवेदनाओं को प्रकट कर जीवन-मूल्यों को विशेष महत्व दिया है।  शायद  इसलिए उनकी  कहानियों के सभी पात्र कष्ट, अभाव, भय, विडंबना और मज़बूरीयों के बीच जीते हुए भी हिम्मत बटोरकर डटकर सामना करते हुए तथा जीवन में खुशियाँ तलाशा करते हुए नजर आतें हैं।उनकी सभी  कहानियाँ  केवल कल्पना पर आधारित न होकर ठोस अनुभव और अटल सत्य पर आधारित हैं।  सूर्यबाला की कहानी की नारी डटकर मुश्किल से मुश्किल चुनौतियों का सामना करना, बाजारवाद के सामने भी न झुकना, निराशा में घिरकर भी आशा बनाये रखना और तुफानो में भी दीप जलाये रखना यानी अंतिम सांसों तक डटकर रहना आदि  हर कहानी के नारी में कूट कूट के भरे हुए गुण सहजता से मिलाजातें हैं।अपने परिवार के सदस्यों के लिए उनके सुख के लिए अपने सारे सपने और अपना सारा जीवन तक त्याग करने वाली गुणों की नारी कहानियों में  चित्रित हैं  जो साहित्य की उच्च कोटि नारी भी कहलातीं हैं।  सूर्यबाला जी के सभी कहानियों में नारी कष्ट झेलती हैं लेकिन हारती नहीं, निरंतर कष्टों को दूर करने के प्रयत्न में हमेश तत्पर रहती हैं।  कभी-कभी इनको आवाज भी उठानी पड़ता हैं लेकिन  कभी  पीछे नहीं हटती हैं, आवश्यकता होने पर जवाब भी देती हैं।

Keywords
समकालीन हिंदी साहित्यकार, कष्ट, अभाव, भय, विडंबना, सूर्यबाला
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