संत साहित्य की सामाजिक चेतना
| Vol-3 | Issue-06 | June 2018 | Published Online: 19 June 2018 PDF | ||
| Author(s) | ||
| डॉ. राकेश कुमार शर्मा 1 | ||
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1राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर। |
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| Abstract | ||
भक्तिकालीन संत कवि और उनका साहित्य एक ऐसे धर्म और समाज की स्थापना करना चाहते थे, जिसमें सभी मनुष्य हो, मानवता के कल्याण की भावना हो और संत काव्य की सामाजिक चेतना केवल संत भक्त कवियों की साधना वैयक्तिक एवं एकान्तिक साधना नहीं थी अपितु वे संपूर्ण समाज को दृष्टि में रखकर चलते थे, समदृष्टि भेदभाव का नाश और एकता का प्रचार इस शाखा के आवश्यक अंग थे। साधना पक्ष की दृष्टि से संतों ने भक्ति और योग दोनो पर बल दिया हैं। धार्मिक पक्ष को सर्वधर्म समन्वय का सार तत्व ही संत मत है। संत मत ही संत काव्य की सामाजिक चेतना है। |
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| Keywords | ||
| समन्वय, पौरूष, ईष्वरोन्मुख, मत-मतान्तर, प्रवृत्तिमूलक, निवृत्तिमूलक, सर्वभूत, निगुर्णमार्गी, निरापद, कालान्तर, विजित, संकीर्णता | ||
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