श्रीलंका-भारत संबंध: उभरते आर्थिक आयाम बदलते परिदृश्य में
| Vol-5 | Issue-2 | February-2020 | Published Online: 16 February 2020 PDF ( 126 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.3801186 | ||
| Author(s) | ||
| समरवीर सिंह 1 | ||
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1शोधार्थी - दक्षिण एशिया अध्ययन केन्द्र राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
भारत-श्रीलंका ने आर्थिक, व्यापारिक, औद्योगिक तथा सांस्कृतिक पर सम्पर्क स्थापित किये हैं। दोनों देश इस दिशा में उत्तरोत्तर प्रगति कर आर्थिक सम्बन्धों को और अधिक मजबूत बनाने के लिए उत्साहित है। दोनों देशों के सम्बन्धों का एक प्रमुख पहलू आर्थिक पक्ष भी है। भारत श्रीलंका से व्यापार करने वाले प्रमुख बड़े देशों में से एक है लेकिन दोनों देशों के व्यापारिक सम्बन्ध सदैव एक जैसे नहीं रहे हैं। दोनों देशों के मध्य आर्थिक सम्बन्धों में रूकावट उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारणों में श्रीलंका में भारतीय व्यापारियों तथा साहूकारों की धूमिल छवि, व्यापार घाटा, व्यापार असंतुलन एवं एक जैसे निर्यात हित प्रमुख है। भारत-श्रीलंका चाय, रबर तथा नारियल के अच्छे उत्पादक हैं अतः दोनों देश इनका निर्यात करते हैं। इस कारण इन उत्पादों के विश्व बाजार में दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हो गये हैं।1 भारत तकनीकी रूप से समृद्ध एवं बेहतर रूप से विकसित होने के कारण श्रीलंका को बहुत सी वस्तुओं का निर्यात करता है। श्रीलंका की निर्यात शक्ति सीमित है। इस कारण परिणाम यह हुआ कि भारत तथा श्रीलंका के बीच व्यापारिक असंतुलन पैदा हो गया। दोनों देश इस असंतुलन से निजात पाना चाहते हैं लेकिन पूर्ण सफलता नहीं मिल रही है। दोनों देशों के व्यापारिक सम्बन्धों को और अधिक सुधारने की आवश्यकता है। भारत को बड़ा तथा विकसित देश होने के नाते श्रीलंका के साथ व्यापार बढ़ाने तथा असंतुलन को कम करने के भावी प्रयास करने आवश्यक है। पुनः क्रम के आधार पर लिए प्रभावी प्रयास संयुक्त उद्योग, तीसरे विश्व के देशों के साथ आपसी व्यापार तथा तीसरे विश्व के देशों को निर्यात का विस्तार औद्योगिक तथा कृषि के क्षेत्रों में विद्यमान सुविधाओं का और अधिक प्रयोग, पर्यटन को प्रोत्साहन आदि के माध्यम से हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकते हैं। |
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| Keywords | ||
| औद्योगिक, साहूकारों, असंतुलन, पर्यटन, वित्त | ||
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