वैश्वीकृत युग में गाँधी का राज आर्थिकी दर्शन की भूमिका

Vol-3 | Issue-01 | January 2018 | Published Online: 28 January 2018    PDF ( 163 KB )
Author(s)
अखिलेन्द्र कुमार रंजन 1

1शोधार्थी, विश्वविद्यालय इतिहास-विभाग, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा

Abstract

गाँधीजी सिद्धान्त निर्माता नही थे, पर फिर भी उनके सिद्धान्त थे। उनके समकालीन, राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक मुद्दों पर विचार सहजता से अभिव्यक्त हुए, जहाँ व्यक्तियों को सामुदायिकता से अधिक महत्व था। राज्य व समाज के सामुहिकता के सिद्धान्त को नकारते हुए गाँधी का तर्क था कि व्यक्ति ही चेतना का अतः भौतिकता का भी प्रयोग कर सकता है। गाँधी ने व्यक्तिगत स्वायŸाा का ऐसा सिद्धान्त दिया जहाँ व्यक्ति अपनी परम्पराओं और समुदाय के अन्तर्गत सषक्त होता है। व्यक्तियों को सारूप करके और उनकी भिन्नता की उपेक्षा करके, आधुनिकता के अन्र्तगत परिभाषित पष्चिमी तर्कवाद ने राज-आर्थिकी व सांस्कृतिक जड़ों के कारण मानव के विविधतपूर्ण स्वभाव की उपेक्षा की है। गाँधी ने आधुनिकता के हमारे अवधारणीकरण की कुछ कमियों को पूरा किया है। ऐसा उन्होंने समकालीन प्रचलनों तथा संस्थाओं मे सŸात रूप से नैतिकता लागू मूल्यांकित करने की आधुनिक प्रकृति उन्हें साधन मात्र बना देती है।

Keywords
आर्थिकी दर्शन वैश्वीकृत गाँधी
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