वैदिक एवं आधुनिक विज्ञान का समन्वय

Vol-4 | Issue-11 | November 2019 | Published Online: 16 November 2019    PDF ( 191 KB )
Author(s)
मीनाक्षी सैनी 1; डाॅ. सहदेव शास्त्री 2

1शोध छात्रा स.ध. राजकीय पी.जी. महाविद्याल ब्यावर, अजमेर (राज.)

2शोध निर्देशक स.ध. राजकीय पी.जी. महाविद्याल ब्यावर, अजमेर (राज.)

Abstract

ऋग्वैदिक ऋचाओं में विज्ञान का वैभव कैसा जगमग कर रहा है इसका निदर्शन करना उचित ही है। चूंकि वेदों में सर्वप्रथम स्थान ऋगवेद का ही आता है और इसका ऋग्वेद ही साक्ष्य है तस्माद् यशात्..................। ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र को देखते ही विज्ञान की खुली झांकी से मन तरंगित हो उठता है और विश्वस्त होता है कि इन संकेतों के प्रत्यक्ष द्रष्टागण समस्त जगत के वन्दनीय थे, जगद्गुरू थे। उन्ही मंत्र द्रष्टागण से भारतभूमि को जगद्गुरूओं की भूमि होने का गौरव प्राप्त हुआ। यतोहि वैज्ञानिक धर्म सब का एक जैसा नहीं हो सकता। देश काल और पात्रता के भेद से भिन्न-भिन्न होना प्राकृत्य ही है। कहा भी गया है-‘‘वैज्ञानिकस्तु धर्मः सर्वेषां नैकरूपःस्यात्। अपि देशकालपात्र भेदतो भिन्नतौचित्यात‘‘(1) भारत का वैज्ञानिक धर्म अतिसूक्ष्म हैएवं सूर्य-चन्द्र पर नियत हैं उसकी अनेकता ही उसकी विशेषता है। वेदों में वैज्ञानिक तत्वों के अन्वेषण से पूर्व यह वेदितव्य है कि हमारे वैदिक ऋषियों और भारतीय एवं पाश्चात्य वेदाध्येताओं ने ‘विज्ञान‘ शब्द को किस प्रकार व्यक्त किया है एवं परिभाषित किया है।

Keywords
वैज्ञानिकस्तु, ऋग्वेद, कर्मकाण्ड, निःश्रेयस, ज्योलाॅजी, अग्निविद्या, कर्मकौशलं, विबभूव
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