लोकगीतो में रची बसी जन्म संस्कारों की युगबोधन
| Vol-6 | Issue-02 | February-2021 | Published Online: 14 February 2021 PDF | ||
| DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i02.031 | ||
| Author(s) | ||
| श्रीमति आरती सैनी 1 | ||
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1असिस्टैंट प्रोफेसर (संगीत वादन) हिन्दू कन्या महाविद्यालय, जीन्द (हरियाणा) |
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| Abstract | ||
मनुष्य कोता प्राप्त करने के कारण अच्छे संस्कारों की आवश्यकता होती है, और हमारे देश में प्राचीन काल से ही ऋषि-मुकनयों ने जन्म के पूर्व से लेकर मृत्य उपरान्त तक मनुष्य संस्कार की मान्यता का निर्माण किया है। जन्म संस्कार और गीत का अपना अलग महत्व है। लोक मानस अपने हृदय के सुख-दुःख, आनंद, विरह, मिलन, प्रेम और घृणा तथा करूणा की धारा से क्रोधित होकर अपने भावों को अपने शब्दों में फंसाकर लोगगीतों के माध्यम से व्यक्त करता है। जन्म से ही उसका जीवन होता है, वहाॅ जनम पूर्व ही माॅ के हृदय में जाग जाता है। पिता का वात्सल्य मित्र है, वहाॅ सामाजिक संबंध ननद-भाौर्जा भी अपने आनंद की अभिव्यक्ति करने की संभावना रखते हैं। यदि हम लोक गीतों को जन्म से संस्कार से जोड़ते हैं, तो यह जन्म के पूर्व से ही नवागत की तैयारी के, उनकी मंगल की कामना, नवप्रसूता के स्वास्थ्य की सीमाओं व रक्षा के लिए देवी-दुनिया की मनौती के गीत गाये जाने लगते हैं। जन्म संस्कारों के अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों में चरूआ, संचत, सोहरे, बधाएं, सरिया, कुंआं पूजन, कनछेदन, झू गीत, पासनी, मुंडन आदि के गीत शामिल किए जा सकते हैं। |
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| Keywords | ||
| जन्म संस्कार, लोकगीत, धार्मिक, सामाजिक | ||
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