राष्ट्रीय आन्दोलन में जयप्रकाश नारायण व लोहिया के विचार

Vol-6 | Issue-07 | July-2021 | Published Online: 15 July 2021    PDF ( 186 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i07.002
Author(s)
भूमिका प्रसाद 1; शाइस्ता बी 2

1शोधछात्रा, राजनीति विज्ञान विभाग, डी0एस0बी0 परिसर, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल।

2शोधछात्रा, राजनीति विज्ञान विभाग, डी0एस0बी0 परिसर, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल।

Abstract

यह बात स्पष्ट हो गयी है कि समाजवादी पहले राष्ट्रवादी थे। उनका समाजवाद कोई काल्पनिक विचार न होकर राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान की खोज में था। इसलिये कभी कभी उन पर राष्ट्रीय समाजवादी होने का आरोप भी लगता था। यह आरोप सच था,किन्तु किसी भी देश का समाजवाद अराष्ट्रीय नही होता है। अपने अपने देशों की समस्याओ के समाधान के सिलसिले में ही समाजवाद की खोज की गयी। समाजवाद के राष्ट्रीय होने की अपेक्षा अन्र्तराष्ट्रीय होने का दावा अधिक सत्य है। जहां तक सभी देशो की समस्याएं एक जैसी है, वहा तक समाजवाद अन्तर्राष्ट्रीय है। किन्तु देशो की भिन्नता एवं समस्याओं के अलगााव से वह राष्ट्रीय भी है। कभी ऐसा लगता है कि वह मूलक राष्ट्रीय है। उसका उद्देश्य राष्ट्रीय समस्याओं का अन्र्तराष्ट्रीय समाधान हैै। कुछ समस्यायें अन्तराष्ट्रीय है। आधुनिक विज्ञान एवं तकनीको ने सभी देशों में समान समस्याएं पैदा की है। इस दृष्टि से वह अन्र्तराष्ट्रीय है,बावजूद इसके कि वह राष्ट्रीय है, रूस व चीन की क्रातियां क्या अन्तराष्ट्रीय है़? क्या उनके मूल में उनकी राष्ट्रीय समस्याएं नहीं है? अगर समाजवाद केवल अन्तराष्ट्रीय होता तो उसका सार्वदेशिक प्रसार होता। सर्वत्र एकरूपता होती। जापान जैसे देश ने समाजवाद को छुआ तक नहीं। किन्तु चीन में समाजवाद मुख्य हेतु बना। इसलिये कि चीन को अपनी समस्या का समाधान समाजवाद में दीखा, जापान के बढ़ते औद्योगीकरण को समाजवाद व्यर्थ लगा।

Keywords
समाजवाद, राष्ट्रवादी, अन्र्तराष्ट्रीय, सार्वदेशिक प्रसार
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