मौलिक अधिकार के रूप में निजता का अधिकार: एक विवेचना
| Vol-4 | Issue-03 | March 2019 | Published Online: 13 March 2019 PDF ( 140 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| विनीता 1 | ||
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1शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग NILM विश्वविद्यालय, कैथल (हीरयाणा) |
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| Abstract | ||
मौलिक अधिकार हमारे जीवन का आधार है। व्यक्ति के बहुमुखी विकास के लिए जिन अधिकारो का प्राप्त होना आवश्यक है, उन्हे हम मौलिक अधिकार कहते है। शुरूआत से ही निजता के अधिकारों को मौलिक अधिकारों में शामिल करने की माँग उठाई जा रही थी। वर्ष 1954 में “एम. पी. शर्मा बनाम सतीश चन्द्रा गद” से हो निजता के अधिकार पर बहस शुरू हो चुकी थी। परन्तु इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानने से इनकार कर दिया अंततः 24 अगस्त 2017 को सर्वोच्च न्यायालय की 9 सद्स्यीय खण्छपीठ ने ‘ के. एस. पुŸाास्वामी बनाय भारत सघं‘ वाद में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ‘निजता के अधिकार‘ को संविधान के ‘अनु. 21‘ के ‘जिवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार‘ का अभिन्न हिस्सा माना, जिसे संविधान के ‘भाग 3‘ द्वारा गारण्टी प्रदान की गयी है। |
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| Keywords | ||
| मौलिक अधिकार, निजता, सर्वोच्य न्यायालय, भाग-3, संविधान, वाद, बनाम, अनुच्छेद 21 | ||
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