मुक्तिबोध के आलोचनात्मक प्रतिमान : ऐतिहासिक, सामाजिक सन्दर्भों का सार्थक उपयोग
| Vol-4 | Issue-04 | April 2019 | Published Online: 15 April 2019 PDF | ||
| Author(s) | ||
| डॉ. अनिता सोनी 1 | ||
|
1प्राध्यापक (हिन्दी), स्नातकोत्तर अध्ययन एवं अनुसंधान केन्द्र, ज.हॉ. शास. स्नात. महाविद्यालय, बैतूल, मध्य प्रदेश |
||
| Abstract | ||
हिन्दी आलोचना की परम्परा में मुक्तिबोध का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। न केवल कवि रूप में, बल्कि चिन्तक आलोचक और कथाकार के रूप में उनका व्यक्तित्व उनकी पीढ़ि के लेखकों में दूर से चमकता है। उन्होंने कविता कर्म द्वारा भीतरी दृष्टि को विकसित किया। कविता के अतिरिक्त कहानी, आलोचना, डायरी, उपन्यास विधाओं में अपने विचार एवं स्वरों को अभिव्यक्त किया।हिन्दी आलोचना परम्परा में मुक्तिबोध का महत्वपूर्ण स्थान है। मुक्तिबोध की आलोचना हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। मुक्तिबोध एक सच्चे युगदृष्टा की भाँति अपने युग की परिस्थितियों, विसंगतियों को यथार्थपरक दृष्टि रखकर ऐतिहासिक, सामाजिक संदों द्वारा व्यक्त करते हैं। ये प्रतीक आलोचना के प्रतिमान रूप में स्पष्ट एवं ग्राह्य हैं। ये प्रतीक हिन्दी आलोचना जगत् को नई दृष्टि प्रदान करते हैं. इस आधार पर इनका मूल्यांकन आवश्यक है। |
||
| Keywords | ||
| आलोचना, ऐतिहासिकता, सामाजिकता, संवेदना, युगबोध, कला, फैंटेसी। | ||
|
Statistics
Article View: 304
|
||

