मानव-अधिकारः उद्गम एवं ऐतिहासिक विकास

Vol-5 | Issue-11 | November-2020 | Published Online: 14 November 2020    PDF ( 411 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i11.020
Author(s)
शाइस्ता बी 1

1शोध छात्रा, राजनीति विज्ञान विभाग, डी0एस0बी0 परिसर, नैनीताल।

Abstract

मानवाधिकार सामान्यता, वे अधिकार हैं जो मानव होने के नाते, प्रत्येक मानव को बिना किसी भेदभाव के जन्म के साथ ही प्राप्त होते हैं। इसके बिना कोई व्यक्ति अपना बौद्धिक मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, नैतिक व आर्थिक विकास नही कर सकता है। यह मानव की गरिमा स्वतंत्रता के लिये आवश्यक है। मानव जाति के लिए मानवाधिकारों का अत्याधिक महत्व है। अतः इसे मूल अधिकार, अन्तर्निहित अधिकार, प्राकृतिक अधिकार, आधारभूत अधिकार व जन्म अधिकार भी कहा जाता है।
शाब्दिक दृष्टि से देखा जाय तो मानवधिकार का अंग्रेजी अनुवाद, जो दो शब्दों से संयोजन से बना है। 'Human' यानि मानव शब्द यूनानी शब्द एन्थ्रोपाॅस से बना है और दूसरा शब्द 'Right' यानि अधिकार एक विस्तृत विचारधारा है। वस्तुतः अधिकारों का अस्तित्व संगठित समाज में ही सम्भव है। यह सर्वांगीण विकास हेतु अति आवश्यक है। प्रो0 आशीर्वादम् के अनुसार, ‘‘अधिकार मनुष्य को प्रकृति से मिले हैं और उसके व्यक्तित्व में निहित हैं वे मनुष्य की प्रकृति के वैसे ही अंश है जैसे उसके शरीर की त्वचा का रंग है।‘‘ लाॅस्की ने लिखा है, ‘‘अधिकार मानव जीवन की परिस्थितियाँ हैं जिसके बिना कोई व्यक्ति अपना पूर्ण विकास नही कर सकता है।‘‘
ग्रीक और रोमन समय में भी मानवाधिकारों का अस्तित्व देखा जा सकता है। मानवाधिकारांे की पश्चिम में उत्पति के विचार विशेष रूप से अधिकारो की प्राप्ति की प्रक्रिया को लेकर वाद-विवाद का एक लम्बा इतिहास रहा है।

Keywords
मानवाधिकार, ऐतिहासिक विकास, आत्म सुरक्षा, सामाजिक अधिकार
Statistics
Article View: 497