भारत – सोवियत संघ संबंध (1947 से 1991 तक)

Vol-5 | Issue-8 | August-2020 | Published Online: 17 August 2020    PDF ( 659 KB )
DOI: https://doi.org/10.31305/rrijm.2020.v05.i08.007
Author(s)
Arbind Kumar 1

1Ex. Assistant Professor In Political Science and Research Associate, Gandhian Study Centre, DAV College, Abohar, Punjab

Abstract

वैसे तो भारत ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में आजादी से पहले ही भाग लेना शुरू कर दिया था | क्योंकि भारत सयुंक्त राष्ट्र का मूल व सक्रिय मैंबर रहा है | परंतु तब भारत के नाम से अग्रेजों द्वारा शासन संचालित होता था | इस लिए भारत के ज्यादा किसी देश के साथ करीबी संबंध नहीं हुए | पर आजा़द होने के बाद भारत ने अपनी भूमिका को विश्व स्तर पर स्वीकार किया | उस समय नव भारत के सामने कई आथिर्क, राजनीतिक और सैनिक गूट खड़े थे |पर भारत के पास इस समय केवल दो ही विकल्प थे या तो वह किसी एक में शामिल हो जाऐ और या फिर किसी में भी शामिल ना हो | भारत ने यही किया कि वह किसी भी गुट में शामिल नहीं हुआ, क्योंकि किसी एक में शामिल होकर दूसरे को भारत नाराज नहीं कर सकता था | एक कारण यह भी था की किसी भी गुट में शामिल होके भारत अपने ऊपर किसी बाहरी शक्ति की बंदिशे नहीं चाहता था | इस कारण भारत ने दोनों गुटों से अलग रहने की नीति अपनाई | ताकि वह अपना स्वतंत्र रहकर विकास कर सके | भारत ने अपनी इस नीति को गुटनिरपेक्षता का नाम दिया | पर इस नीति का यह मतलब बिलकुल नही था कि भारत ने अपने आप को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से अलग थलग कर लिया था | भारत सभी देशों से सम्मानपूर्वक संबंध कायम करना चाहता था, ताकि अपना आथिर्क, राजनीतिक, सामाजिक और सैनिक विकास कर सके | उस समय अमेरिका और सोवियत संघ जैसे देश सबसे शक्तिशाली देश थे, भारत इन दोनों देशों का सहयोग प्राप्त कर अपनी विश्व स्तर पर पहिचान कायम करना चाहता था | पर शुरुआत से ही भारत के संबंध अमेरिका से ज्यादा सोवियत संघ से ज्यादा अच्छे रहे हैं | दोनों की विचारधारा में फर्क होने के बाद भी संबंध हमेशा सौहार्द्र पूर्ण रहे हैं | और वर्तमान समय तक भी बने हुए हैं |

Keywords
भारत-सोवियत संघ, राजनीती, संयुक्त राष्ट्र
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